आईये, इन दिनों UPSC विवाद में छाये'मुख़र्जी नगर'की आप सब से करीबी मुलाक़ात करवाते हैं:-
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मुख़र्जी नगर; जहाँ स्टूडेंट्स किताबें कांख में दबाये उनींदी आँखों में चाय की भाप से चीरा लगाकर सुबह देखतें है..
..जहाँ दोपहर.. कांधे पर बैग टांगे, थक कर पसीने-पसीने रूम में लौटकर पंखे- कूलर के भर्भराते शोर में बिना टिफिन खाए बेड पर औंधे पड़े रहते है.. (वो"फुर्सत के रात दिन"वाला नहीं)।
जहाँ शाम.. 25 गज के कमरे में"मैं, मेरी तन्हाई"और किताब के साथ गुजरती हो, या गार्डन में वजन कम करने के फितूर के साथ या किताबों की दुकान में लईय्या-चना-रेवड़ ी की तरह दिमाग का भोजन जुटाने में गुजरती है।
..जहाँ संघर्ष का रास्ता मकान मालिक को सँभालने, टिफिन वाले को डांटने और बालकनी से टापनेे से शुरू होकर upsc की परीक्षा तक जाता है, वहां सुबह लोवर और चप्पल में भी दौड़ कर क्लास पहुँचने वाला और शाम की चहलकदमी में अंतर्र्राष्ट्री य मुद्दों पर चर्चा करने वाला इतर-मैकाले वर्ग भारत की व्यवहारिक राजनीति से दूर ही रह गया। .. आन्दोलन, अनशन में एकजुट दिखने वाला मुख़र्जी नगर असलियत में अपने भविष्य के प्रति इतना ओवर कॉन्सियस है, कि क्लास में रोज साथ बैठने वाले से भी बात नहीं करता, सालों से बगल में रहने वाले को भी जनता तक नहीं। ..मुख़र्जी नगर की 10 में से 10 प्रेम कहानियां सुबह की क्लास से शुरू होकर शाम में पढाई के कंसंट्रेशन में दम तोड़ ही देतीं हैं।
... वास्तव में कोई राजनीति नहीं..सिविल सर्विस में भविष्य के अलावा कोई दूसरी सोच ही नहीं..पर सरकार मासूम से मुखर्जी नगर को हिंदी फिल्म का वो हीरों बनाने पर तुली है, जिसकी माँ-बाप, बहन पर जुल्म हुए हो और अब बड़ा होकर वह बदला लेगा.. फिर सुखद अंत..।
हालाँकि, यहाँ की अर्थव्यवस्था किराये, किराने, चाय, चीनी, दूध की खपत पर ही आश्रित ..पर व्यवस्था को हमारी कोई सुध नहीं..और अगर है भी तो भई! व्यवस्थित करने की कोई जल्दी नहीं। बड़ा डायनेमिक-सा भी है दिल्ली के दिल का ये टुकड़ा.. हिंदी, भोजपुरी, मैथली, राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, उत्तर-पूर्वी और न जाने कितनी भाषाओँ का शोर यहाँ के हर कोने से सुनाई दे ही जाता है..पर इन सब भाषाओँ का भविष्य तय कर रही है अंग्रेजी (?) ही।
फिलहाल!.. धक्का-मुक्की कर लाईन में लग कर बत्रा में सीटी बजा-बजा कर सलमान को देखने वाले लड़के-लड़कियों के जीवन की ही फिल्म बदल गयी ..खुद की'किक'को ढूँढ रहे थे और पड़ी सरकार की एक जोरदार'किक'।।
मंहगाई के इस दौर में भी 10/ - के 5 समोसो का बंदोबस्त भी आखिर कर ही लिया था..छोटी कढ़ाई, छोटे-छोटे समोसे और नुक्कड़ पर घुमंन्तु टाइप फेरी वाला..यूँ चटकारे लेते लेते.."चटाक!!"..उफ़! ! शायद सरकार ने दे मारा।।
हर बारिश यमुना के रेड अलर्ट पर हँसने वाला मुखर्जी नगर इस बार इस लीक से हटकर आये लाठी-डंडे वाले सैलाब से स्तब्ध है।
..SBI ATM पर लम्बी लाइन लगाने वाला मुखर्जी नगर..'अग्रवाल- मेरठ'उफ़! सारा फ्रस्ट्रेशन बस यही की मिठाईयों पर निकालने वाला मुखर्जी नगर, मोमोस-पास्ता पर लार टपकाने वाला मुखर्जी नगर..रिचार्ज दुकानों को लखपति बनाने वाला मुखर्जी नगर..बड़े पोस्टरों पर 5वी मंजिल पर लटकने वाला मुखर्जी नगर..बियर की हमेशा शोर्टेज वाला मुखर्जी नगर.. और रात के अंधेरों में कई कमरों की रोशनियों से रोशन रहने वाला मुखर्जी नगर आज बड़ी बेचैन करवटें ले रहा है..।।
अरे! मुखर्जी नगर ने बरसों से 18-18 घंटे अपने दिमाग को अपनी गर्दन पर स्थिर बनाये रखा है..फिर इन दिनों यह विचलन कैसा..अस्तित्व की लड़ाई में मशगूल यहाँ के प्रवासी बाशिंदों को पुलिस दौड़ा-दौड़ा कर पीटती रही और सरकार को शत्रुघ्न सिन्हा ने डांट दिया हो जैसे.."खामोश!"
मोदी, केजरीवाल, कांग्रेस, अन्ना हजारे के खेमें में बँटी चर्चाएँ चाय के स्टाल में कल तलक बड़ी आम रही जहाँ, वहां आज CSAT मुद्दे पर सरकार के अंगूर खट्टे हो चले..आश्वासन के पैबंद फटे में भी फटे को सिले जा रहे है।...और कलैंडर 24 अगस्त को किसी बिछड़ी प्रेमिका सा पुकार रहा है..
"टशन..अनशन..अब टेंशन"..!!..... .बस आज यही है मुख़र्जी नगर.. हालाँकि, बेबस है, उदास है, आक्रोशित भी है, पर आशान्वित है और उससे भी ज्यादा नखरे बाज है.. क्योकि जो पढ़ाओगे फिर पढ़ लेगा.. उहुं! असीमित क्षमताओं वाला है ये मुखर्जी नगर।।...असीमित. ..अनंत...
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पर मुखर्जी नगर को सताने वालों....जनता माफ़ नहीं करेगी।।
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मुख़र्जी नगर; जहाँ स्टूडेंट्स किताबें कांख में दबाये उनींदी आँखों में चाय की भाप से चीरा लगाकर सुबह देखतें है..
..जहाँ दोपहर.. कांधे पर बैग टांगे, थक कर पसीने-पसीने रूम में लौटकर पंखे- कूलर के भर्भराते शोर में बिना टिफिन खाए बेड पर औंधे पड़े रहते है.. (वो"फुर्सत के रात दिन"वाला नहीं)।
जहाँ शाम.. 25 गज के कमरे में"मैं, मेरी तन्हाई"और किताब के साथ गुजरती हो, या गार्डन में वजन कम करने के फितूर के साथ या किताबों की दुकान में लईय्या-चना-रेवड़ ी की तरह दिमाग का भोजन जुटाने में गुजरती है।
..जहाँ संघर्ष का रास्ता मकान मालिक को सँभालने, टिफिन वाले को डांटने और बालकनी से टापनेे से शुरू होकर upsc की परीक्षा तक जाता है, वहां सुबह लोवर और चप्पल में भी दौड़ कर क्लास पहुँचने वाला और शाम की चहलकदमी में अंतर्र्राष्ट्री य मुद्दों पर चर्चा करने वाला इतर-मैकाले वर्ग भारत की व्यवहारिक राजनीति से दूर ही रह गया। .. आन्दोलन, अनशन में एकजुट दिखने वाला मुख़र्जी नगर असलियत में अपने भविष्य के प्रति इतना ओवर कॉन्सियस है, कि क्लास में रोज साथ बैठने वाले से भी बात नहीं करता, सालों से बगल में रहने वाले को भी जनता तक नहीं। ..मुख़र्जी नगर की 10 में से 10 प्रेम कहानियां सुबह की क्लास से शुरू होकर शाम में पढाई के कंसंट्रेशन में दम तोड़ ही देतीं हैं।
... वास्तव में कोई राजनीति नहीं..सिविल सर्विस में भविष्य के अलावा कोई दूसरी सोच ही नहीं..पर सरकार मासूम से मुखर्जी नगर को हिंदी फिल्म का वो हीरों बनाने पर तुली है, जिसकी माँ-बाप, बहन पर जुल्म हुए हो और अब बड़ा होकर वह बदला लेगा.. फिर सुखद अंत..।
हालाँकि, यहाँ की अर्थव्यवस्था किराये, किराने, चाय, चीनी, दूध की खपत पर ही आश्रित ..पर व्यवस्था को हमारी कोई सुध नहीं..और अगर है भी तो भई! व्यवस्थित करने की कोई जल्दी नहीं। बड़ा डायनेमिक-सा भी है दिल्ली के दिल का ये टुकड़ा.. हिंदी, भोजपुरी, मैथली, राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, उत्तर-पूर्वी और न जाने कितनी भाषाओँ का शोर यहाँ के हर कोने से सुनाई दे ही जाता है..पर इन सब भाषाओँ का भविष्य तय कर रही है अंग्रेजी (?) ही।
फिलहाल!.. धक्का-मुक्की कर लाईन में लग कर बत्रा में सीटी बजा-बजा कर सलमान को देखने वाले लड़के-लड़कियों के जीवन की ही फिल्म बदल गयी ..खुद की'किक'को ढूँढ रहे थे और पड़ी सरकार की एक जोरदार'किक'।।
मंहगाई के इस दौर में भी 10/ - के 5 समोसो का बंदोबस्त भी आखिर कर ही लिया था..छोटी कढ़ाई, छोटे-छोटे समोसे और नुक्कड़ पर घुमंन्तु टाइप फेरी वाला..यूँ चटकारे लेते लेते.."चटाक!!"..उफ़! ! शायद सरकार ने दे मारा।।
हर बारिश यमुना के रेड अलर्ट पर हँसने वाला मुखर्जी नगर इस बार इस लीक से हटकर आये लाठी-डंडे वाले सैलाब से स्तब्ध है।
..SBI ATM पर लम्बी लाइन लगाने वाला मुखर्जी नगर..'अग्रवाल- मेरठ'उफ़! सारा फ्रस्ट्रेशन बस यही की मिठाईयों पर निकालने वाला मुखर्जी नगर, मोमोस-पास्ता पर लार टपकाने वाला मुखर्जी नगर..रिचार्ज दुकानों को लखपति बनाने वाला मुखर्जी नगर..बड़े पोस्टरों पर 5वी मंजिल पर लटकने वाला मुखर्जी नगर..बियर की हमेशा शोर्टेज वाला मुखर्जी नगर.. और रात के अंधेरों में कई कमरों की रोशनियों से रोशन रहने वाला मुखर्जी नगर आज बड़ी बेचैन करवटें ले रहा है..।।
अरे! मुखर्जी नगर ने बरसों से 18-18 घंटे अपने दिमाग को अपनी गर्दन पर स्थिर बनाये रखा है..फिर इन दिनों यह विचलन कैसा..अस्तित्व की लड़ाई में मशगूल यहाँ के प्रवासी बाशिंदों को पुलिस दौड़ा-दौड़ा कर पीटती रही और सरकार को शत्रुघ्न सिन्हा ने डांट दिया हो जैसे.."खामोश!"
मोदी, केजरीवाल, कांग्रेस, अन्ना हजारे के खेमें में बँटी चर्चाएँ चाय के स्टाल में कल तलक बड़ी आम रही जहाँ, वहां आज CSAT मुद्दे पर सरकार के अंगूर खट्टे हो चले..आश्वासन के पैबंद फटे में भी फटे को सिले जा रहे है।...और कलैंडर 24 अगस्त को किसी बिछड़ी प्रेमिका सा पुकार रहा है..
"टशन..अनशन..अब टेंशन"..!!..... .बस आज यही है मुख़र्जी नगर.. हालाँकि, बेबस है, उदास है, आक्रोशित भी है, पर आशान्वित है और उससे भी ज्यादा नखरे बाज है.. क्योकि जो पढ़ाओगे फिर पढ़ लेगा.. उहुं! असीमित क्षमताओं वाला है ये मुखर्जी नगर।।...असीमित. ..अनंत...
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पर मुखर्जी नगर को सताने वालों....जनता माफ़ नहीं करेगी।।
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