अपने स्कूल के दौर में स्वतंत्रता दिवस वाकई में त्यौहार जैसे ही मनाया जाता था, एक दिन पहले से अपन स्कूल ड्रेस चकाचक इस्त्री किया करते, और इस्त्री करते वक़्त इस बात का ख़ास ख्याल रखा जाता था कि, ड्रेस में डबल क्रीज़ ना बनने पाये, फिर जूतो में क्रीम पॉलिश लगा के ब्रश मार मार के जूते चेरी पॉलिश के ऐड में आने वाले जूतो से भी ज्यादा चमकाए जाते थे,
पंद्रह अगस्त की सुबह से नहा धोके अपनी साइकिल वाली सवारी पे बिना बस्ते के निकल पड़ते थे स्कूल के लिए, और अपना मानना था साइकिल के पीछे अगर बस्ता ना लटका को तो साइकिल भी फ़ेरारी जैसे फर्राटे से भागती है, सुबह सुबह सारे चौक चौराहो पे बजते हुए देशभक्ति गाने सुनते और ध्वजारोहण की तैयारियां देखते हुए स्कूल जाने का मज़ा ही कुछ और था, स्कूल पहुँच के लाइन में लग के ध्वजारोहण के बाद एक सुर में राष्ट्रगान गाना, और कभी भाषण देने का मौका मिले तो डरते हकलाते भाषण देने के बाद भी प्राइम मिनिस्टर वाली फीलिंग आ ही जाती थी, फिर अपना ही कोई दोस्त नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की तो कोई बालगंगाधर तिलक की ड्रेस में स्टेज में आता, और उनका ध्येय वाक्य बोल जाता "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा" "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा"
फिर एक लाइन में लग के छोटे छोटे पैकेट में बूंदी और सेव मिलने के बाद तो जीवन सार्थक सा लगने लगता था, गज़ब का जज़्बा होता था स्वतंत्रता दिवस मनाने का...
और घर जाने से पहले हमारे गुरूजी सबको समझाते थे कि, इस आज़ादी की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है हमने, देश के लाखो लोगो की शहादत के बाद ये आज़ादी मिली है, इसलिए ये जज़्बा आने वाली पीढ़ियों में भी जगाये रखना,
ताकि वो 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाये, नेशनल हॉलिडे के रूप में नहीं
पंद्रह अगस्त की सुबह से नहा धोके अपनी साइकिल वाली सवारी पे बिना बस्ते के निकल पड़ते थे स्कूल के लिए, और अपना मानना था साइकिल के पीछे अगर बस्ता ना लटका को तो साइकिल भी फ़ेरारी जैसे फर्राटे से भागती है, सुबह सुबह सारे चौक चौराहो पे बजते हुए देशभक्ति गाने सुनते और ध्वजारोहण की तैयारियां देखते हुए स्कूल जाने का मज़ा ही कुछ और था, स्कूल पहुँच के लाइन में लग के ध्वजारोहण के बाद एक सुर में राष्ट्रगान गाना, और कभी भाषण देने का मौका मिले तो डरते हकलाते भाषण देने के बाद भी प्राइम मिनिस्टर वाली फीलिंग आ ही जाती थी, फिर अपना ही कोई दोस्त नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की तो कोई बालगंगाधर तिलक की ड्रेस में स्टेज में आता, और उनका ध्येय वाक्य बोल जाता "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा" "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा"
फिर एक लाइन में लग के छोटे छोटे पैकेट में बूंदी और सेव मिलने के बाद तो जीवन सार्थक सा लगने लगता था, गज़ब का जज़्बा होता था स्वतंत्रता दिवस मनाने का...
और घर जाने से पहले हमारे गुरूजी सबको समझाते थे कि, इस आज़ादी की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है हमने, देश के लाखो लोगो की शहादत के बाद ये आज़ादी मिली है, इसलिए ये जज़्बा आने वाली पीढ़ियों में भी जगाये रखना,
ताकि वो 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाये, नेशनल हॉलिडे के रूप में नहीं
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