क्या आप भी सारा दिन व्हाट्सऐप और फेसबुक यूज करते हैं तो पढ़े यह खबर
नई दिल्ली: अगर आपका भी सारा दिन मोबाईल पर व्हाट्सऐप और फेसबुक पर बीतता हैं तो सचेत हो जाएं। हो सकता है कि ये इंटरनेट और डिजिटल दुनिया की लत लगने की निशानी हो। ऐसा ही एक मामला दिल्ली में देखने को मिला हैं। दिल्ली में रहने वाले 18 साल के सागर अग्रवाल जहां भी होते हैं, उनका स्मार्टफ़ोन उनके साथ होता है। शुरुआत में उनके पिता अमित अग्रवाल को लगता था कि ये कुछ दिनों का ही क्रेज है लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी यह क्रेज घटने की बजाय बढ़ता चला गया। अलबत्ता सागर ज़्यादा चिड़चिड़े और असामाजिक हो गए। पहले तो उनके खाने-पीने का रूटीन बिगड़ा और उसके बाद धिरे-धिरे देर रात तक मोबाइल पर सर्फिंग करने की वजह से सुबह जल्दी उठने की आदत भी छूट गई।
अपने बेटे में आए इन बदलावों को देखकर चिंतित पिता अमित अग्रवाल ने जब घर में पूछा तो पाया कि उनका बेटा सारा दिन मोबाईल पर इंटरनेट का ज़रूरत से ज़्यादा उपयोग कर रहा है। अमित अग्रवाल कहते हैं, "दो साल पहले मैंने बच्चे को स्मार्टफ़ोन दिलाया था और उसके बाद से ही वह हम लोगों से दूर होता चला गया। न टाइम पर खाना खाता है, न किसी से मिलना चाहता है।
हाल ही में शुरू हुई दिल्ली की एक ग़ैरसरकारी संस्था ‘सेंटर फॉर चिल्ड्रेन इन इंटरनेट एंड टेक्नॉलॉजी डिस्ट्रेस’ संस्था बच्चों की काउंसलिंग करती है। संस्था वर्कशॉप, काउंसलिंग सेशन इत्यादी आयोजित करवाती है जिसमें बच्चे अपनी बात कह सकते हैं। बच्चों को साथ बैठाकर शतरंज, कैरम जैसे इंडोर गेम्स खिलाए जाते हैं। उन्हें थोड़ा समय इंटरनेट से दूर रखने की कोशिश की जाती है।
संस्था की काउंसलर वैलेंटीना त्रिवेदी कहती हैं कि इंटरनेट सीमित तौर पर केवल ज़रूरत के समय इस्तेमाल किया जाए तो इससे नुकसान नहीं होता। वह कहती हैं, "दो साल की उम्र से ही बच्चे जब प्री स्कूल और होम ट्यूशन में आते हैं, तभी से उनके जीवन में स्ट्रेस बनना शुरू हो जाता है। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं उनसे ऊल-जुलूल उम्मीदें रखी जाती हैं, परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का दबाव होता है। ऐसे में इंटरनेट उन्हें एक स्ट्रेस फ्री माहौल देता है और वे उसमें समाते चले जाते हैं।"
इन आदतों से रहे दूर-
-हमेशा मोबाइल अपने साथ रखना।
-देर रात तक स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप को यूज करना।
-खाने-पीने का वक़्त और आदतें बदलना।
-परिजनों, दोस्तो के घर आने-जाने, बातचीत से कतराना
-किसी से बात करते वक्त भी अपने मोबाइल स्क्रीन को देखते रहना
-मोबाइल न चलने या न मिलने पर चिड़चिड़ा होना।
-कॉल से ज़्यादा टेक्स्ट मैसेज का इस्तेमाल करना।
अपने बेटे में आए इन बदलावों को देखकर चिंतित पिता अमित अग्रवाल ने जब घर में पूछा तो पाया कि उनका बेटा सारा दिन मोबाईल पर इंटरनेट का ज़रूरत से ज़्यादा उपयोग कर रहा है। अमित अग्रवाल कहते हैं, "दो साल पहले मैंने बच्चे को स्मार्टफ़ोन दिलाया था और उसके बाद से ही वह हम लोगों से दूर होता चला गया। न टाइम पर खाना खाता है, न किसी से मिलना चाहता है।
हाल ही में शुरू हुई दिल्ली की एक ग़ैरसरकारी संस्था ‘सेंटर फॉर चिल्ड्रेन इन इंटरनेट एंड टेक्नॉलॉजी डिस्ट्रेस’ संस्था बच्चों की काउंसलिंग करती है। संस्था वर्कशॉप, काउंसलिंग सेशन इत्यादी आयोजित करवाती है जिसमें बच्चे अपनी बात कह सकते हैं। बच्चों को साथ बैठाकर शतरंज, कैरम जैसे इंडोर गेम्स खिलाए जाते हैं। उन्हें थोड़ा समय इंटरनेट से दूर रखने की कोशिश की जाती है।
संस्था की काउंसलर वैलेंटीना त्रिवेदी कहती हैं कि इंटरनेट सीमित तौर पर केवल ज़रूरत के समय इस्तेमाल किया जाए तो इससे नुकसान नहीं होता। वह कहती हैं, "दो साल की उम्र से ही बच्चे जब प्री स्कूल और होम ट्यूशन में आते हैं, तभी से उनके जीवन में स्ट्रेस बनना शुरू हो जाता है। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं उनसे ऊल-जुलूल उम्मीदें रखी जाती हैं, परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का दबाव होता है। ऐसे में इंटरनेट उन्हें एक स्ट्रेस फ्री माहौल देता है और वे उसमें समाते चले जाते हैं।"
इन आदतों से रहे दूर-
-हमेशा मोबाइल अपने साथ रखना।
-देर रात तक स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप को यूज करना।
-खाने-पीने का वक़्त और आदतें बदलना।
-परिजनों, दोस्तो के घर आने-जाने, बातचीत से कतराना
-किसी से बात करते वक्त भी अपने मोबाइल स्क्रीन को देखते रहना
-मोबाइल न चलने या न मिलने पर चिड़चिड़ा होना।
-कॉल से ज़्यादा टेक्स्ट मैसेज का इस्तेमाल करना।
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