साईं भगवान थे या नहीं आज ये मीडिया में बहस का मुद्दा बन चुका है। शारदा पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा साईं को भगवान नहीं मानने वाले बयान ने देश में एक अजीब माहौल पैदा कर दिया है। साईं को भगवान मामने वाले शंकराचार्य के इस बयान से काफी गुस्से में हैं और देश के कई हिस्सों में तो उनका (शंकराचार्य) का पुतला भी फूंका गया। मीडिया ने भी इस बहती गंगा में हाथ धोना ही नहीं बल्कि नहाना उचित समझा, खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने। प्राइम टाइम में टीवी चैनलों पर कुछ साईं भक्त, शंकराचार्य के बातों का समर्थन करने वाले और मुस्लिम वर्ग के लोगों को बैठाकर ये डिबेट कराने लगे।आस्था तर्कों और शास्त्रार्थ की मोहताज नहीं होती। आस्था किसी शंकराचार्य के सवाल से भी नहीं मिटेगी। सनद रहे यह पूछता है कि शंकराचार्य ने साईं पर सवाल क्यों उठाया? उनके प्रति आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों को अंधविश्वासी क्यों कहा? क्या उनको यह कहने का अधिकार है?
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द ने कहा कि साईं की पूजा करना हिन्दू धर्म को बांटने की साजिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग चाहते हैं कि हिन्दू धर्म कमजोर हो। स्वरूपानंद ने कहा कि साईं बाबा के नाम पर कमाई की जा रही है और हिन्दू धर्म को बांटने के लिए विदेशी ताकतें भी हावी हैं। शंकराचार्य ने कहा है, �यह कहा जाता है कि साई बाबा हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक हैं। ये प्रतीक तो तब होता जब हिंदुओं के साथ मुसलमान भी मानते। मुसलमान तो उसे मानते नहीं। हम क्यों मानें? हमारी एकता का प्रतीक कहां हैं वो? हिन्दू- मुस्लिम एकता का भी प्रतीक नहीं हैं वो। ये एक भ्रम है जो समाज में फैलाया जा रहा है।� केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने साईं को पूजने का जब समर्थन किया तो शंकराचार्य तिलमिला उठे और मोदी सरकार से उमा भारती को बर्खास्त करने की मांग तक कर डाली।
कई सालों के बाद देश को एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार मिली है। इस दौरान यदि धर्म से जुड़े ऐसे मामले सामने आएंगे तो इसका परिणाम क्या होगा? क्या हमारे देश में और कोई समस्या है ही नहीं। अगर साईं से जुड़ा कोई सवाल करना ही है तो साईं के नाम पर जो ट्रस्ट बनाए गए हैं उनसे पूछा जाए। देश में विभाजक रेखाएं खींचने का कोई नया षडयंत्र जरुर चल रहा है। पहली बार देश में शिया-सुन्नी और अब हिंदू और साई भक्त का विवाद इतने शोर के साथ उठाया जा रहा है। अब मुस्लिम-मुस्लिम और हिंदू-हिंदू टकराव का नया खेत जोता जा रहा है। और ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदू भी अल्पसंख्यक की श्रेणी में आ जाए। इन मुद्दों को ज्यादा प्रचारित करने में मीडिया का विशेष हाथ है। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे मुद्दों को तूल नहीं देना चाहिए।
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