हमारी विचारधारा में जीत कों बडी एहमियत दी जाती हैं। लगातार पूरे साल इसलिए बच्चोँ को बेहतरीन नतीज़े लाने को कहा जाता है। जो जीता वही सिकंदर। जो हारा उसे लानत का इतना डर रहता है कि कई बार बात जान देने तक आ जाती है।
हमने सिर्फ जीतने का गौरव जाना है। कम रह जाने या हार जाने में लज्जा ही देखीहै।
बस , यही कही पर झूठ बोलने की नींव भी पड़ जाती हैं। हारे तो कहानियाँ गढ़ने लगतें है। कभी इन्हे बहाना बनाकर उपहास भी बना लेते है। इसी टांग -खिंचाई के दौर में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए खुद को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी शुरू हों जाती हैं ,
समझना जरुरी है कि सब नहीं जीत सकते। ठीक उसी तरह हर कोई हमेशा नहीं हारता। जो हार के कारणों का मंथन करते है वें जीतते अवश्य है।
विजेता बदलते रहते है
उसी तरह पराजय भी चंचल होती है
हमने सिर्फ जीतने का गौरव जाना है। कम रह जाने या हार जाने में लज्जा ही देखीहै।
बस , यही कही पर झूठ बोलने की नींव भी पड़ जाती हैं। हारे तो कहानियाँ गढ़ने लगतें है। कभी इन्हे बहाना बनाकर उपहास भी बना लेते है। इसी टांग -खिंचाई के दौर में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए खुद को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी शुरू हों जाती हैं ,
समझना जरुरी है कि सब नहीं जीत सकते। ठीक उसी तरह हर कोई हमेशा नहीं हारता। जो हार के कारणों का मंथन करते है वें जीतते अवश्य है।
विजेता बदलते रहते है
उसी तरह पराजय भी चंचल होती है
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