अगर आपका बच्चा कर रहा रेप से संबंधित सवाल, तो समाधान के लिए पढ़े पूरी खबर

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?

जयकुमार भाटी/जोधपुर। कोविड काल में डिजिटल का माध्यम बच्चों की शिक्षा के लिए एक सुरक्षित विकल्प बना। लेकिन आज इसका गलत प्रयोग हो रहा है। मोबाइल के बढ़ते चलन ने सभी को इसकी लत लगा दी। बच्चे हो या बड़े सभी के लिए मोबाइल आवश्यक हो गया। बच्चे पूरा-पूरा दिन मोबाइल पर गेम और ऑनलाइन चैटिंग में जुटे रहने से स्थिति ओर भी भयावह हो गई है। चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट श्वेता पारीक ने बताया कि एक रिसर्च में सामने आया है कि आज के समय में हर तीसरा व्यक्ति मोबाइल एडिक्शन का शिकार हो चुका है। इसके चलते मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और नींद ना आने की घटनाएं बढ़ने लगी है। बच्चे अपनी जिज्ञासा का समाधान मोबाइल पर ढूंढ रहे है। जिससे उन्हें सही जवाब नहीं मिलते ओर उनका भटकाव बढ़ रहा है। ऐसे में मोबाइल के प्रयोग के दौरान पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। खासकर बच्चाें पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

बच्चों के सवालों से परिजन परेशान
पारीक ने बताया कि हाल ही में शहर में हुई गैंगरेप की घटना के बाद कई परिजनों ने सम्पर्क करके बताया कि उनके बच्चे - रेप क्या होता है.., क्या मैं भी रेप कर सकता हूं.. क्या मेरे साथ भी रेप हो सकता है.., रेप से बच्चा पैदा होता है.. जैसे सवाल करते है। वहीं मोबाइल पर इसकी जानकारी नहीं होने के बारे में भी बताते है। ऐसे में हम अपने बच्चों को इस बारे में क्या बताएं। पारीक का कहना है कि बच्‍चों का मन बहुत नाजुक होता है और वे किसी भी बात को बड़ी आसानी से दिल पर लगा लेते हैं। बचपन में कोई हादसा हुआ हो, किसी की बात से मन पर चोट लगी हो, बच्‍चे ऐसी बातों को अपने मन में छिपाए रखते हैं और इसका बुरा असर उनके मानसिक, भावनात्‍मक और शारीरिक विकास पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि चाइल्‍ड साइकोलॉजी से बच्‍चों के मन में क्‍या चल रहा है, यह जानने में मदद मिलती है। यहां बच्चों के बिहेवियर को समझने के साथ उनकी भावनाओं, मानसिक एवं शारीरिक विकास को प्रभावित कर रही चीजों व कारकों पर ध्‍यान देते है। परिजनों को बच्चों के सवालों से भागने की बजाए उन्हें किसी अन्य उदाहरण से समझाना चाहिए। जिससे बच्चों की जिज्ञासा शांत होने के साथ भटकाव की स्थिति नहीं बने।

बच्चों को ना कहना सिखाना चाहिए
रेप से संबंधित सवाल करने पर बच्चों को यह बताए कि शरीर के कुछ अंग प्राइवेट पार्ट होते हैं और उन्हें किसी दूसरे को छूने नहीं देना चाहिए। बच्चों को गुड़ टच बेड टच की जानकारी देने के साथ ना कहना भी सिखाना चाहिए। वहीं बच्चों को यह भी बताया कि जिस तरह से हम अपनी कीमती वस्तुओं की हिफाजत करते है, उसी तरह हमारे शरीर के कुछ अंग बहुत कीमती होते है, जिसकी सुरक्षा बहुत जरूरी है। बच्चों के मोबाइल देखने की समय सीमा तय होनी चाहिए। बच्चों को अपोजिट जेंडर (विपरीत लिंग) का सम्मान करना सिखाना चाहिए, जिससे इस तरह की घटनाओं में कमी आ सकें।
डॉ श्वेता पारीक, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/Ujil7hA
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment