मां की ये कैसी दर्दभरी कहानीः खाने को अन्न का दाना नहीं, फिर भी इकलौते बेटे की बचाने में जुटी है जान

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आगोलाई। आगोलाई निवासी 38 वर्षीय युवक सत्तार मिरासी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो ऐसे गंभीर रोग के भंवर में फंस जाएगा, जिससे निकलना मुश्किल होगा। सत्तार की दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं। छोटी-मोटी मजदूरी व शादियों में ढोल बजाकर परिवार चलाने वाले सत्तार की छोटी उम्र में पिता का साया उठ जाने के बाद मां गैरो देवी ने जैसे-तैसे चार बेटियों व इकलौते बेटे सत्तार का पालन-पोषण कर बड़ा किया।

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बेटियां ससुराल चली गई तथा सत्तार की भी हैसियत अनुसार शादी की। शादी के 2-3 साल बाद सत्तार की पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया। करीब तीन साल पहले सत्तार को पीलिया हो गया तो मां ने बेटियों की मदद जोधपुर में अस्पताल में भर्ती कराया। गांधी अस्पताल, मथुरादास अस्पताल, एम्स सहित शहर के निजी अस्पतालों में कई दिनों तक भटकने के बाद जब स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ तो अपने प्लॉट पर कर्जा लेकर गैरो देवी बेटे को इलाज के लिए अहमदाबाद लेकर गई। वहां पर 15-20 दिन इलाज के बाद डॉक्टरों ने सत्तार की दोनों किडनी खराब होता बताकर घर भेज दिया।

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उसके बाद पिछले ढाई-तीन वर्ष से 65 वर्षीय बीमार मां गैरो देवी इस आशा के साथ कच्चे छपरे में 24 घंटे अपने इकलौते पुत्र सत्तार की देखरेख में लगी हुई हैं कि जल्दी ही ठीक हो जाएगा, लेकिन परिवार में कमाने वाला कोई नहीं होने से पिछले तीन साल में परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि इलाज की छोड़ो, घर में खाने के लिए पैसे नहीं है। मां गैरो देवी ने बताया कि सप्ताह में दो बार डायलिसिस के लिए जोधपुर जाना पड़ता है। एकमात्र विधवा पेंशन आ रही है, जिससे घर चलाना भी मुश्किल हो गया है।



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