'छाती के बाल उखाड़े...नाखून निकाले, बेहोश होने तक बरसते रहे डंडे'
आपात काल की कहानी राज्यसभा सांसद राजेंद्र गहलोत की जुबानी
देश में 1975 में 25 जून रात्रि 12 बजे आपातकाल थोपा गया। सभी नागिरक अधिकार छीन लिए गए। मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी गई। बोलने-लिखने पर प्रतिबंध के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। आपातकाल के विरोध में मुखरित भैरो सिंह शेखावत, ललितकिशोर चतुर्वेदी, दामोदर बंग, रामनारायण विश्नोई सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 15 जुलाई, 1975 को 'भय मिटाओ' आंदोलन शुरू हुआ। दिल्ली में हंसराज गुप्ता ने गिरफ्तारी दी तो जोधपुर में शंकरराज लोढ़ा ने गिरफ्तारी दी। 16 जुलाई को घनश्याम छंगाणी ने गिरफ्तारी दी। मैं भूमिगत रहकर लोकतंत्र बहाली के लिए आंदोलन कर रहा था। 17 जुलाई को घनश्याम डागा 'चिंगारी' नामक अखबार बांटते गिरफ्तार हुए। शाम तीन बजे हमने आपातकाल के विरोध में चित्रा सिनेमा से शहर होते हुए सोजती गेट तक जुलूस निकाला। सोजती गेट में मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
जयकारों के बीच विदाईमुझे जन समूह ने जयकारों के बीच विदाई दी। मुझे पुलिस लाइन ले जाया गया, वहां गिरफ्तार किए गए विद्यार्थी घनश्याम डागा की पुलिस सिपाही निर्ममता से पिटाई कर रहे थे। मैंने विरोध किया। पूछा- क्यों मार रहे हो। इतना पूछते ही सिपाही मुझ पर टूट पड़े। छाती के बाल उखाड़ दिए। अंगूठे के नाखून तक निकाल दिए। जख्मी हालत में ही मुझे जेल ले गए तो जेलर ने पुलिस सिपाहियों से कहा कि जेल मुर्दों के लिए नहीं...जीवित लोगों के लिए होती है।
रंग लाया युवाओं का संघर्ष
अधिकारियों के दबाव में चलते मुझे जेल में लिया गया और काल कोठरी में पटक दिया। सुबह जेल में मीसा बंदियों को पता चला तो मुझे घायल अवस्था में जेल में अस्पताल में भेजने के लिए कहा गया। आपातकाल उत्पीड़न, अत्याचार और दमन की कहानी है। देश के नौजवानों ने 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक संघर्ष करके लोकतंत्र की पुन: स्थापना की।
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