Slipdisk interlaminar : केवल एक टांके से स्लिपडिस्क की इंटरलमिनार एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी

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जोधपुर. महात्मा गांधी अस्पताल में इंटरलमिनर तकनीक से पहली बार सर्जरी की गई। देश के कुछ गिने-चुने सरकारी अस्पतालों में ही दुनिया की यह उन्नत तकनीक उपलब्ध है।

ओसियां निवासी 25 वर्षीय गजेंद्र कमर में स्लिप ***** की समस्या थी। नस दबने से पांव में साइटिका की तकलीफ रहती थी। मरीज के पांव में सुन्नापन रहता था। रोजमर्रा के काम में भी तकलीफ थी। दवाई से ठीक नहीं होने पर स्पाइन सर्जन डॉ.महेंद्र सिंह टाक ने इनको दूरबीन से ऑपरेशन की सलाह दी। वरिष्ठ आचार्य डॉ. महेश भाटी के मार्गदर्शन में स्पाइन सर्जन डॉ. महेंद्र टाक की टीम ने यह जटिल ऑपरेशन किया। सम्पूर्ण ऑपरेशन एक सेंटीमीटर से भी छोटी सी नली के माध्यम से पूरा किया गया, जिसमे मरीज को बिना किसी चीर फाड़ के केवल एक टांके में पूरा ऑपरेशन सम्पूर्ण हुआ।

ऐसे हुआ ऑपरेशन

महात्मा गांधी अस्पतालअस्थि रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. महेंद्र कुमार असेरी ने बताया कि महज एक सूक्ष्म छेद के माध्यम से संपूर्ण ऑपरेशन किया गया। इस तकनीक में रीढ की हड्डी में जिस जगह नस दबी हुई होती है, एक्सरे मशीन की सहायता से उसी जगह पर इस एंडोस्कोप को एक सूक्ष्म छेद से नली के माध्यम से प्रवेश कराया जाता है फिर पूरा ऑपरेशन इसी एंडोस्कोप की सहायता से किया जाता है।

अगले दिन ही छुट्टी

रीढ़ की हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. महेंद्र सिंह टाक ने बताया कि चीरफाड़ के ऑपरेशन में घाव भरने में काफी समय लगता है। रूटीन में आने में कई माह लग जाते हैं, लेकिन इस इंटरलामिनर इंडोस्कोपी एडवांस तकनीक में ज्यादातर मरीजों को अगले दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है। कुछ ही दिनों में मरीज अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट आता है। मोटापे एवं शुगर के मरीजों के लिए यह तकनीक अत्यंत ही लाभ दायक हैं।

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ऑपरेशन टीम में ये

अस्थि रोग विभागाध्यक्ष डॉ. महेंद्र कुमार असेरी, सर्जन डॉ. महेंद्र सिंह टाक, डॉ. महेश भाटी, डॉ. जियालाल,डॉ. मोहित डॉ. संकल्प तथा डॉ विजेंद्र। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. सरिता जनवेजा,डॉ.प्रमिला सोनी, डॉ.चेतन, डॉ. ललिता तथा डॉ. वैशाली। नर्सिंग इंचार्ज इकबाल कायमखानी, मीनाक्षी अग्रवाल, प्रिया, गणपत एवं वार्ड बॉय अकरम, संजय व नदीम।नि:शुल्क ऑपरेशन

इस मरीज का चिरजीवी योजना में नि:शुल्क ऑपरेशन हुआ है। ऐसे ऑपरेशन इससे पहले केवल बड़े शहरों में तीन से चार लाख रुपए में संभव हो पाते थे।

- राजश्री बेहरा, अक्षीक्षक, महात्मा गांधी अस्पताल



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