jodhpur : नौ माह से बेटी की खैर-खबर से बेखबर मां की गोद में फिर गूंजी किलकारी

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बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई

जोधपुर. पिछले नौ महीनों से अपनी नवजात बेटी की खैर-खबर से बेखबर एक मां की आंखें तब भर आई, जब राजस्थान हाईकोर्ट की दखल से उसे दोबारा बेटी नसीब हुई। इस कहानी में कई ऐसे मोड़ हैं, जो समाज में घटित हो रही खेदजनक तस्वीर उजागर करते हैं।

न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायाधीश राजेंद्र प्रकाश सोनी की खंडपीठ में हाल ही बालिग हुई भीलवाड़ा निवासी एक युवती ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करते हुए अपने पिता से खुद की बेटी की कस्टडी दिलाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता लगभग 17 साल की उम्र में एक युवक के साथ चली गई थी, जिससे वह गर्भवती हुई और पिछले साल अगस्त में जब उसने बेटी को जन्म दिया, तब वह अपने पिता के घर में थी। याचिका के अनुसार, जब याचिकाकर्ता की बेटी छह दिनों की थी, उसके पिता ने उसे दूर कर दिया। याची नहीं जानती थी कि अब उसकी बेटी कहां है। बालिग होने के बाद युवती दोबारा उसी युवक के साथ रहने लग गई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने पैरवी की।

रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

पिछली सुनवाई पर अतिरिक्त महाधिवक्ता एमए सिद्दीकी ने तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश की, जिसके अनुसार बच्ची अनुज नाम के व्यक्ति के पास मुंबई में थी और वह बेटी को जैविक मां को देने को तैयार था। रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया गया कि याचिकाकर्ता के पिता ने छह दिन के शिशु की कस्टडी आशा रामावत को सौंप दी थी। जैसा कि दावा है कि आशा 2020-2021 में बाल कल्याण समिति की सदस्य थी और उसने शिशु को दिल्ली निवासी मंजू पोखरना की बहन को सौंप दिया, जिसने संभवतः बच्चे को मुंबई निवासी अपनी बेटी के सुपुर्द किया। मंगलवार की सुनवाई के दौरान अनुज की पत्नी दिशा अपने अधिवक्ता के साथ अदालत में पेश हुईं और शिशु को सुपुर्द किया। दिशा ने कहा कि बच्ची की कस्टडी उन्हें भीलवाड़ा की आशा रामावत ने सौंपी थी। हालांकि उनके अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि इस तरह बच्ची का स्थानांतरण कानून के विपरीत है, लेकिन उनका दावा था कि बच्ची की देखभाल के लिए उसकी कस्टडी ली गई थी।

आशा की भूमिका पर भी सवाल

कोर्ट ने याचिकाकर्ता, उसके पिता तथा बाल कल्याण समिति की पूर्व सदस्य और कथित सामाजिक कार्यकर्ता आशा की भूमिका पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता बालिग होने तक खामोश रही, उसने बेटी का पता लगाने की कोशिश नहीं की, याची के पिता ने छह दिनों की बच्ची को एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता को सौंप दिया और वहां से बच्ची मुंबई तक पहुंच गई। कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी जैविक मां को देने के निर्देश के साथ पुलिस को सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ विधि सम्मत कार्रवाई करने को कहा है।



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