मुम्बई में माटी के रंग बिखेर रही फलोदी की परम्परागत गेर

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फलोदी/ जोधपुर. मुम्बई भी फलोदी की परम्परागत गेर के रंगों से सराबोर है। यहां के प्रवासी व्यक्ति हो रोजगार की तलाश में फलोदी से मुम्बई गए वहां पर बस गए, उन्होंने माटी की होली की परम्पराओं को नहीं भुलाया है, बल्कि यहां से जुडाव रखने के लिए प्रवासियों ने फलोदी की अनूठी परम्परागत गेर की कमी को भी पूरा कर लिया।

फलोदी से जाकर मुम्बई में रसबस गए प्रवासियों ने तीन दशक पूर्व फलोदी की परम्परागत गेर का आगाज किया, जो वर्तमान में भी नियमित रूप से संचालित हो रही है।

होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी के दिन फलोदी के वाशिंदे अपने रहवासी इलाकों में गेर निकालते है और सभी प्रवासियों के घर गेर लेकर पहुंचते है। वे परदेश में भी फलोदी की परम्पराओं को निभा रहे है और फलोदी की परम्परागत गेर निकाल कर फाग व होली के भजनों के कार्यक्रम कर फलोदी की माटी से जुडे होने का अहसास कर रहे हैं।

विरार के साथ भयंदर से कालबा देवी तक गेर
गौरतलब है कि मुम्बई के विरार के साथ भयंदर से कालबादेवी तक फलोदी के प्रवासियों का रहवास है। ऐसे में फलोदी के प्रवासी पुष्करणा ब्राह्मण समाज की ओर से मुम्बई के भयंदर से कालबा देवी तक परम्परागत गेर निकाली जाती है। इसमें इस क्षेत्र के सभी समाजों के फलोदी के लोग शामिल होते है।

गेर का आयोजन पुष्करणा समाज की ओर से किया जाता है। जानकारों की मानें तो होली की गेर का आगाज विरार में काशी विश्वनाथ मंदिर से किया गया था, जिसके बाद फलोदी के प्रवासी क्षेत्रों में भी प्रचलन बढा और अब विरार के साथ भयंदर से कालबादेवी तक गेर निकाली जाती है। जिस घर के आगे गेर पहुंचती है, वहां गेर का आदर सत्कार ना केवल फलोदी के वाशिंदे करते है, बल्कि मराठी भी गेरियों के लिए चाय, नाश्ता का प्रबंधन कर भाईचारा की मिसाल दे रहे है।

भयंदर पूर्व में तालाब रोड पर गोवदेवी माता मंदिर के आगे होलिका दहन कर मां लटियाल व होली के परम्परागत भजनों का गायन किया जाता है। यहां गेरियों के लिए नाश्ते की व्यवस्था भी रहती है। मुम्बई के सालासर हनुमान मंदिर, पदमेश्वर महादेव मंदिर के आगे भजनों के कार्यक्रम होते है।

गेर सुबह नौ बजे रवाना होकर दोपहर एक बजे खारी गांव वाली हवेली तक पहुंच कर समाप्त होती है। गेर निकालने के लिए अनुमति ली जाती है। गेर निकालने की परम्परा का निर्वहन मधुसूदन पुरोहित, मुखिया श्यामसुन्दर थानवी, बंशीलाल चाण्डा, विजय व्यास, महेश व्यास, जेठमल बोहरा, कमल व्यास, अरुण पुरोहित की अगुवाई में होता है।


रहता है माटी से जुड़ाव
मुम्बई में रहते फलोदी की होली से दूर नहीं रहा जा सकता। ऐसे में तीन दशक पूर्व मुम्बई में ही फलोदी की परम्परागत गेर निकालने का आगाज किया, जो वर्तमान समय में भी जारी है।
- महेश अन्ना टरू होली के रसिया प्रवासी


प्रशासन का है सहयोग
फलोदी से दूर रहकर फलोदी जैसी होली व गेर का आनन्द ले सके, इसके लिए परम्परागत गेर शुरू की गई। यहां के प्रशासन ने हमारी परम्पराओं से जुडे रहने के लिए सहयोग किया है। जिससे हम अपनों दूर होकर परम्पराओं के पास है।
- शरद बिस्सा, गेर के व्यवस्थापक


अपनों के संग होता है हुडदंग
फलोदी में होली खेलने और गेर में शामिल होने का अपना अंदाज है, लेकिन यहां की गेर को भी फलोदी की तरह ढालने का प्रयास कर रहे है। तीन दशक से गेर में होली की रंगत जम रही है।
- सुनिल एच व्यास होली के रसिया


बचपन से है होली का क्रेज
हमारे मोहल्ले नदी पार क्षेत्र में होली का क्रेज बहुत अधिक है। ऐसे में जब मुम्बई आया तो हर साल होली पर फलोदी चला जाता था, लेकिन अब गृहस्थ जीवन में जाना नहीं हो पाता। ऐसे में मुम्बई की इस परम्परागत गेर का हिस्सा बनकर गेर बोलने का शोक पूरा कर लेता हूं।
- चन्द्रशेखर व्यास गेर का रसिया प्रवासी



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