आजादी के अमृत महोत्सव में भी याद नहीं आया मारवाड़ के पहले स्वाधीनता सेनानी का बलिदान
अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठाने वाले पहले क्रांतिकारी भटनोखा के भोम सिंह करमसोत
हनुमान गालवा
जोधपुर. मारवाड़ में अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठाने वाले पहले क्रांतिकारी भटनोखा के भोम सिंह करमसोत का बलिदान आजादी के अमृत महोत्सव में भी याद नहीं आया। रियासती शासन और अंग्रेजी हुकूमत के कोपभाजन का शिकार इसकी शौर्यगाथा केवल किवदंतियों में ही जिंदा है। स्वाधीनता समर में अपने प्राणों की आहुति देने वाले मारवाड़ के इस पहले स्वाधीनता सेनानी का रियासती शासन और अंग्रेजी हुकूमत के कोपभाजन के भय से आम आदमी उस समय भी उचित सम्मान नहीं दे पाए और आजादी के बाद भी उनकी शहादत को भुला दिया गया।
राठौड़ां री ख्यात (जोधपुर राज्य का इतिहास-सीहा से महाराजा मानसिंह) के तृतीय खंड के पृष्ठ 850 पर जोधपुर का किला अंग्रेजों को सौंपने के दौरान भोम सिंह करमसोत की बगावत का पूरा विवरण दर्ज है। इसमें लिखा है...अंग्रेजों से संधि के बाद किले में अंग्रेजों का थाना स्थापित करने के लिए आसोज सुदी 6, विक्रमी संवत 1891 को अंग्रेज कप्तान मेहरानगढ़ में दाखिल हुए। किले में असीमीदारां में नौकर भटनोखा निवासी भोम सिंह करमसोत ने सूरजपोल के आगे अंग्रेज एजेंट लडलु पर तलवार से हमला किया। हमले में लडलु के सिर पर तीन टांके आए और तीन अंग्रेज सिपाही चोटिल हुए। अंग्रेज सिपाही और रियासती सिपाही भोमसिंह पर टूट पड़े और जख्मी हालात में किले से बार धकेल दिया। अंग्रेज और रियासती शासन के कोपभाजन के भय से उनके निकट कोई नहीं आया। चार-पांच दिन बाद घायल भोमसिंह का दम टूट गया।
भटनोखा का गौरव
भोम सिंह करमसोत जिस भटनोखा गांव के थे, वह उस समय जोधपुर रियासत के आसोप परगने में था। अब यह भटनोखा नागौर जिले की मूंडवा तहसील में है। आसोप के ठाकुर शिवदान सिंह 1857 की क्रांति में आहुवा युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह के साथ अगुवा क्रांतिकारियों में शामिल थे। क्रांतिकारियों ने जोधपुर की सेना और अंग्रेजों की सेना को तीन बार दौड़ाया।------------------------------
1857 की क्रांति से पहले ही क्रांति का शंखनादअंग्रेजों के साथ सबसे पहली संधि जोधपुर रियासत के साथ हुई। मेहरानगढ़ में अंग्रेज दाखिल हुए तो महाराजा मानसिंह के सेवक भटनोखा निवासी भोमसिंह ने तलवार उठाई। अंग्रेज कप्तान और अंग्रेजी सिपाही चोटिल हुए, लेकिन भोमसिंह वीरगति को प्राप्त हुए। ज्ञात इतिहास में देखा जाए तो 1857 की क्रांति से पहले ही मारवाड़ में स्वाधीनता संग्राम का शंखनाद कर दिया गया था। ऐसे बलिदानी वीरों का राष्ट्रीय स्मारक होना चाहिए। राजाओं ने अपना राज बचाने के लिए भले ही अंग्रेजों से संधियां की, लेकिन उनको आम आदमी का कभी समर्थन नहीं रहा।
- प्रो. गोविंद सिंह राठौड़, जाने-माने साहित्यकार
गुमनाम शहीदों को सामने लाएं
अभी तक हमारे सामने जो इतिहास है, आधा-अधूरा है। कई ऐतिहािसक तथ्य अभी भी सामने नहीं आए हैं। स्वाधीनता समर के गुमनाम शहीदों को सामने लाया जाना चाहिए, ताकि आजादी को अक्षुण्ण रखने के लिए युवा पीढ़ी को प्रेरित किया जा सके। आजादी के लिए किए गए संघर्ष की गाथाओं को सामने लाने के लिए शोध को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। भोम सिंह करमसोत की तरह यदि सभी अंग्रेजों के मुकाबले का साहस दिखाते तो देश अंग्रेजों का गुलाम नहीं होता।
- डॉ. विक्रम सिंह भाटी, निदेशक, श्री नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ
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