कांग्रेस के डीएनए में अनुशासन नहीं

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संदीप पुरोहित

कांग्रेस में अनुशासनहीनता कोई नई बात नहीं है। पार्टी के नेताओं को अनुशासन का पाठ कितनी ही बार पढ़ाया जा चुका है पर कांग्रेस के नेता इस विषय में कमजोर हैं। वे हर बार फेल हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण उनकी निजी महत्वाकांक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह सारी धड़ेबाजी बयानबाजी सत्ता या संगठन में पद पाने के लिए ही की जाती है। कांग्रेस को राजस्थान में शासन में आए लगभग 4 वर्ष हो गए हैं पर चार दिन ऐसे नहीं निकले जब नेताओं के मनमुटाव की खबर नहीं आई हो। आलाकमान के नुमाइंदे सिर्फ आदेश निर्देश जारी करते रहते हैं पर उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता है।

पार्टी संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पहले भी कहा था कि कोई बयानबाजी नहीं होगी पर उसका कोई असर नहीं हुआ था। दूर की बात क्या करें, मंगलवार की ही बात कर लें जब वेणुगोपाल अनुशासन का पाठ पढा रहे थे तभी कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और वरिष्ठ नेता हरीश चौधरी ने फिर अपनी ढपली अपना राग शुरू कर दिया। इस पर वेणुगोपाल ने थोड़े तेवर दिखाए पर कितनी भी डांट डपट या समझाइश कर लो, नतीजा वही ढाक के तीन पात रहेगा। वेणुगोपाल ने तो पहले भी सभी नेताओं के संयमित बयानबाजी की एडवाइजरी जारी की थी। इसके बाद भी राजेन्द्र गुढ़ा, वेदप्रकाश सोलंकी, परसादीलाल मीना, खिलाड़ीलाल वैरवा, दिव्या मदरेणा यहां तक की दोनों बड़े नेता भी बयानबाजी करने से नहीं चूकते हैं।

इसके पीछे का मुख्य कारण सबकी सत्ता लालसा है। कांग्रेस नेताओं के डीएनए में सत्ता का भोग शामिल हो चुका है। पार्टी नेताओं को बगैर सत्ता के रहने की आदत नहीं है। इनके इस रोग पर पहले कुछ काबू पाया हुआ था तो उसका कारण दिल्ली में पार्टी नेतृत्व बेहद मजबूत था। इस रोग की जड में जाएंगे तो आप पाएंगे विचारधारा का त्याग। कांग्रेस आज अपने अस्तित्व के लिए लड रही है तो उसके पीछे विचारधारा का त्याग है। आज गांधी के ग्राम स्वराज से लेकर सेवादल की प्रभात फेरियां सब कांग्रेस से गायब हो चुकी है। भाजपा को इससे सबक लेना चाहिए। कमल वाशिंग मशीन में धुलाई कर जो रातों रात नेताओं का दल बदल करा कर पार्टी में शामिल किया जाता है उनके डीएनए में भी सत्ता का भोग है। कोई भी पार्टी अपनी विचारधारा और सिद्धातों से हट जाएगी तो उसका हश्र ऐसा ही होगा। पार्टी ब्लाक अध्यक्ष तक नियुक्तियां नहीं कर पा रही है गुटबाजी के चलते।

वक्त रहते कांग्रेस ने इस पर ध्यान दिया होता तो आज यह हालात नहीं होते। एक कांग्रेस में कई कांग्रेस पनप रही हैं तो कैसे अनुशासन कायम होगा। कोई सिंधी सारंगी बजाता है तो कोई कमायचा तो कोई भपंग तो कोई नागफणी सबका अपना अपना स्वर है। पार्टी को अनुशासित रखना है तो नीचे से विचारधारा और सिद्धातों के आधार पर नेताओं के फौज खड़ी करनी होगी। तभी डीएनए में सत्ता की जगह विचारधारा आएगी। इसी से अनुशासन कायम होगा।



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