जोधपुर।
मारवाड़ के प्रसिद्ध लोक देवता बाबा रामदेव के मेले में कपडे़ से बने घोड़ों का अत्यधिक महत्व है। पांच बांस की मुख्य खप्चियों से बने इन घोड़ों का सम्बन्ध पंच महाभूत पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि व वायु से लगाया जा सकता है। श्रद्धालु अपने किसी विशिष्ट कार्य या मन्नत पूरी होने पर श्रद्धानुसार आकार का कपड़े का घोड़ा बनाकर उसे अपने कन्धे पर उठाकर पैदल चलते हुए लोक देवता बाबा रामदेव के धाम रूणिचा(रामदेवरा) में चढ़ाते है। जहां पूर्व में लोग मन्नत पूरी होने पर घोड़ा चढ़ाते थे, कुछ परम्परा का निर्वहन तो कुछ लोग श्रद्धा व शौक के रूप में इन घोड़ो को जोश व उत्साह से ले जाते है।
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जोधपुर व रामदेवरा में ही बनते है यह घोड़ें
इन घोड़ों का बड़ा आकार, कद-काठी व लावण्यता वास्तविक घोड़े की छवि प्रकट करते है। इन कलात्मक घोड़ों को बनाने का काम मेहनत और कारीगरीयुक्त होता है, जो केवल जोधपुर व रामदेवरा में ही किया जाता है।
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समय के साथ बदला आकार व बनाने की विधि
- 20 से 25 साल पहले कपड़े की कतरन से छोटे घोड़े बनाए जाते थे, लेकिन आज के समय में सूखी घास और थर्माकॉल से बनाए जा रहे है।
- पूर्व में केवल छोटे घोड़े 1 से 2 फीट के ही बनाए जाते थे। समय के साथ 4 से 6 फीट तक और 8 से 9 फीट तक बने, जो अब 12 फीट तक के बनने लगे है।
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पुरुष ही बनाते है, महिलाएं केवल श्रृंगार करती है
हस्तशिल्पी प्रेमाराम, सुरेश, राजा, नौरंग के अनुसार बांस की पांच खप्चियों को आपस में सूत की डोरी से जोड़कर उन पर घास लपेटकर एक ‘‘जीव‘‘ बनाया जाता है। घोड़े के ‘‘जीव‘‘ को बनाने से लेकर घोड़े को पूर्ण आकार देने का काम पुरुष कारीगर ही करते है। द्वितीय स्तर में बनाए गए जीव के ऊपर घोड़े के नाप व आकार के अनुरूप घासफूस लपेटा जाता है। जिसमें घोड़े की कद-काठी और बाद में मुंह को मूर्तरूप दिया जाता है। तीसरे स्तर पर उस पर प्लास्टिक पन्नी लगाई जाती है। प्लास्टिक पन्नी बारिश से घोडे़ को भीगने से बचाती है। बारिश से भीगने के बाद 25 किलोग्राम का घोड़ा भी 100 किलोग्राम तक का हो जाता है। चतुर्थ स्तर में घासफूस से बने घोड़े पर महिलाएं सफेद कपड़े की सिलाई कर कई तरह के रंग-बिरंगे कपड़े, मोती, मालाओं, चमकीली कोर, तुर्रा, ऊन से बनी लटकन व आभूषणों आदि से घोडे़ का श्रृंगार करती है।
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