जोधपुर।
चांदपोल स्थित भगवान् रामेश्वरनाथ मन्दिर, जोधपुर के अति प्राचीन शिवालयों में जाना जाता है । कहा जाता है कि इसकी स्थापना यहां पर लगभग 12वीं शताब्दी में एक ब्रह्मचारी ने ईश्वरीय प्रेरणा से की थी । यह देश के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। जोधपुर शहर की स्थापना से लेकर ही इसे राज्य प्रश्रय प्राप्त रहा है । इतिहास से यह ज्ञात होता है कि यह शिवालय जोधपुर के राठौड़ वंशी राजा-महाराजाओं का श्रद्धा व आस्था का प्रमुख स्थल रहा है। इसके निर्माण से लेकर समय - समय पर इसके जीर्णोद्धार का कार्य मारवाड़ के गौरवशाली राठौड़ शासकों की ओर से करवाया गया। शेरशाह सूरी के समय यवन सेना के आक्रमण में इस मंदिर को तोड़ दिया गया था । सवाई राजा सूरसिंह ने इसका पुनर्निमाण करवाया था । इसके अलावा भी, यह विशेष चमत्कार ही रहा कि इस पावन धाम पर धर्मान्ध शासकों ने कई बार तोड़़फोड़़ की, इसके बावजूद भी मंदिर के आराध्यों को कोई क्षति नहीं हुई।
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राव मालदेव के शासन काल से पूर्व भगवान रामेश्वर नाथ का अस्तित्व
मुहता नैणसी लिखित मारवाड़ रा परगनां री विगत के अनुसार राव मालदेव के शासनकाल में रामा नामक बनिया ने विक्रम संवत 1595 में चांदपोल विद्याशाला मार्ग पर राम बावड़ी का निर्माण करवाया था । इससे यह स्पष्ट होता है कि रामेश्वर जी के ज्योतिर्मय शिव के अस्तित्व राव मालदेव के शासन काल से पूर्व था । इसके साथ ही एक छोटा सा मंदिर भी बनवाया गया । बाद में सवाई राजा सूरसिंह के जमाने में इस बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया गया । इस क्षेत्र में सवाई राजा सूरसिंह की ओर से सूरज कुण्ड का नवीन निर्माण भी करवाया गया था । मंंदिर पुजारी मनमोहन बोहरा, संदीप बोहरा ने बताया कि वर्तमान में मूल गर्भ गृह में भगवान् रामेश्वरजी का शिवलिंग , दो माता पार्वती के विग्रह , मनोकामेश्वर शिवलिंग , दो गणेशजी के विग्रह , स्वामी कार्तिकेय और भगवान् सूर्यनारायण के विग्रह विराजमान है ।
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