Kargil Vijay Diwas: जब करगिल का बुलावा आया तो पत्नी के हाथों से मेहंदी भी नहीं उतरी थी

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जोधपुर. सात फेरों की रस्म के एक पखवाड़े बाद ही बालेसर क्षेत्र के बालेसर दुर्गावता गांव निवासी भंवर सिंह इंदा को अवकाश निरस्त कर देश की रक्षा के लिए सीमा पर जाना पड़ा। पंद्रह दिनों तक भंवर सिंह ने घुसपैठियों के छक्के छुड़ाए। कइ यों को मौत के घाट उतारा लेकिन 28 जून 1999 का दिन उन पर भारी पड़ा। वे दुश्मनों की गोली का शिकार हो गए। महज 22-23 साल की उम्र में ही भंवर सिंह देश के लिए शहीद हो गए।जब वे कारगिल पहुंचे तब उनकी शादी हुई ही थी। शादी के 15 दिन बाद ही उन्होंने घुसपैठियों के खिलाफ बंदूक उठा ली थी।

शहीद भंवरसिंह की पत्नी इंद्र कंवर का अपने पति के साथ महज 15 दिन का साथ रहा। जब कारगिल का बुलावा आया तो इंद्र कंवर के हाथों की मेहंदी सुर्ख थी, लेकिन देश पुकार रहा था इसलिए वे बॉर्डर पर चले गए। बकौल इन्द्र कंवर उस समय 15 दिनों के साथ के बाद बिछुडऩे का गम तो है लेकिन जब लोग कहते हैं कि देखो यह शहीद की पत्नी है, वीरांगना है... तो एक अलग ही सम्मान महसूस होता है। पन्द्रह दिनों के साथ के दौरान भी शहीद ने देशभक्ति को लेकर काफी बताया। तब गर्व हुआ कि पति फौज में है।

राजपूत राइफल्स में भर्ती हुए थे भंवर सिंह
जोधपुर का शेरगढ़ कस्बा सेना के लिए जाना जाता है। यहां कई परिवारों ने सेना में सेवाएं दी है और देश के लिए कुर्बानी भी। हालांकि भंवर सिंह के परिवार से कोई सेना में नहीं था लेकिन मन में देशभक्ति की भावना हिलोरें लेती रहती थी। जब भी कहीं सेना भर्ती रैली की सूचना मिलती, भंवर सिंह वहां पहुंच जाते। आखिरकर एक सेना भर्ती में उनका चयन हो गया। उन्हें 27 राजपूत राइफल्स में भर्ती किया गया। बेटा सेना में नौकरी लग गया तो परिजनों ने शादी की बात चलाई। रिश्ता पक्का कर भंवर सिंह को गांव बुलाया। वे एक माह के अवकाश पर आए। शादी को पन्द्रह दिन ही बीते थे कि करगिल युद्ध की सूचना मिली और अवकाश निरस्त कर लौटना पड़ा। बाद में भंवर सिंह तिरंगे में लिपटकर गांव पहुंचे।



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