दो पहियों पर सवार शहरी सरकार, नहीं लगा बेड़ा पार

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जोधपुर। शहरी विकास के लिए पहली बार नगर निगम को दो भागों में बांटा गया। ठीक एक साल पहले दोनों शहरी सरकारों ने काम करना शुरू किया। यह 12 माह का कार्यकाल कोरोना नियंत्रण और आधारभूत सुविधाएं पूरी करने में ही निकल गया। जनता ने दोनों निकायों में अलग-अलग पार्टियों के नेतृत्व में हाथ में कमान सौंपी, लेकिन बजट की कमी के चलते विकास की नैया पार नहीं लग सकी।
निगम उत्तर व दक्षिण दोनों में बोर्ड बने एक साल हो गया है। इससे पहले एक साल तक किसी का शासन नहीं था और प्रशासक बैठाए गए थे। जब दोनों निगम को राजनीतिक नेतृत्व मिला तो लगा कि अब विकास की गाड़ी पटरी पर लौटेगी। कोरोना के कारण प्रभावित हुई अर्थव्यवस्था का असर सीधे शहरी सरकार पर भी देखने को मिला। एक बजट बैठक और एक परिचायात्मक महज दो बोर्ड बैठकें ही दोनों निगम में हो पाई।

राजनीतिक नियुक्तियां भी अधूरी
कांग्रेस निगम उत्तर में कमेटियों के अध्यक्ष व सदस्य निर्धारित नहीं कर पाई है। तय समयावधि के बाद यह अधिकार राज्य सरकार के पास चले गए, जहां से इन नियुक्तियों का अब तक अधिकार है। भाजपा बोर्ड ने यह नियुक्ति अपने स्तर पर ही कर दी थी।

इधर, भाजपा उत्तर निगम में नेता प्रतिपक्ष व उप नेता नहीं चुन पाई है। ऐसे में विपक्ष की बुलंद आवाज की कमी है। जबकि दक्षिण निगम में कांग्रेस ने यह कार्य कर लिया है।

बजट में 800 करोड़ के सपने
दोनों ही नगर निगम ने अपने-अपने बजट में कुल 800 करोड़ के सपने शहर को दिखाए थे। नगर निगम उत्तर में जहां कांग्रेस का बोर्ड है। आय के साधन कम है। उसने अपने पहले बजट में 506 करोड़ का बजट रखा। निगम दक्षिण में भाजपा का बोर्ड है। आय के साधन भी उत्तर की तुलना में ज्यादा है। उसने 310 करोड़ का बजट पारित किया, लेकिन न तो अपेक्षा के अनुरूप निगम को आय हुई और न ही वापस विकास कार्यों पर खर्च हुआ।

यहां आज भी रार
- बजट में तय हुआ कि निगम दक्षिण अपनी यूडी टैक्स की आय का 20 निगम उत्तर को देगा। यहां दोनों निगम में विवाद शुरू हुआ, लेकिन इसका समाधान आज तक नहीं हुआ।
- सरकार से मिलने वाली ग्रांट सीधी निगम उत्तर को मिली, इस बार भी दोनों में रार कायम है।
- शहर को हरा-भरा करने के लिए 14वे वित्त आयोग के तहत 62 करोड़ की राशि भी निगम उत्तर को मिलेगी, यह कार्य करवाने के लिए नोडल एजेंसी भी उत्तर निगम होगा। ऐसे में यहां भी आपसी खींचतान स्वाभाविक है।

उम्मीदें जो अभी तक अधूरी
- नई सडक़ पार्र्किंग सुविधा का विकास
- एयरपोर्ट हस्तांतरण के बाद जो राशि मिलनी थी, वह अब तक नहीं मिली है।
- पर्यटन विकास का खाका खींचा गया, लेकिन अब भी अब तक अधूरा है।
- प्रत्येक वार्ड में विकास कार्यो की घोषणा, मगर पूरा नहीं हुआ कार्य।
- सीवरेज सिस्टम काफी पुराना हो गया है, लेकिन इसको बदलने के लिए भी बजट नहीं मिला है।
- हैप्पीनेस सडक़, मसाला चौक जैसे कई प्रोजेक्ट भी अधूरे हैं।



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