जोधपुर।
कृषि विश्वविद्यालय विभिन्न कृषि शोधों व नवाचारों के साथ जीरा, सरसो, चना, बाजरी, मूंग, मोठ, अश्वगंधा, मेहन्दी, तिल व स्थानीय स्तर की फसलों की लुप्त होती किस्मों को बचाने का काम भी कर रहा है। रोम की इंटरनेशनल बायोडायवर्सिटी बोर्ड व ग्लोबल एनवॉयरमेंट फैसिलिटी (जेफ) की ओर से मिले प्रोजेक्ट के तहत विवि काम कर रहा है। प्रदेश में संचालित 5 कृषि विवि में अन्तरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट हासिल करने वाला प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय है। प्रोजेक्ट में प्रदेश के करीब 2 हजार किसानों को लाभान्वित करने की योजना है। विवि किसानों को लुप्त हो रही फसलों के संरक्षण के साथ उनकी नई वैरायटी पैदा करने, उच्च तकनीकी इस्तेमाल करने की जानकारी दे रहा है, ताकि उत्पादकता, उत्पादन, किसान की आय व सामाजिक स्तर बढ़े। इसके अलावा, बीज भण्ड़ारण के लिए सामुदायिक उन्नत बीज बैंक की व्यवस्था की गई है। ---
राजस्थान के तीन जिले शामिल
प्रोजेक्ट के तहत राजस्थान के तीन जिलों जोधपुर, बाड़मेर व जैसलमेर में काम किया जा रहा है। विवि जोधपुर जिले के ओसिया के गोविन्दपुरा व मानसागर तथा बाड़मेर के चौहटन के धीरासर व धोख गांव में कार्य कर रहा है। इसमें ग्राविस व काजरी भी अपने-अपने क्षेत्रों में काम कर रही है।
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इस वर्ष 250 किलो बीज किसानों में वितरण
प्रोजेक्ट के तहत विवि ने इस वर्ष सरसो की स्थानीय किस्मों के 150 किलो, चना के 80 व जीरे के 30 किलो बीज तैयार कर किसानों में वितरण किए। जो इन्हीं फसलों की अपनी किस्मों के साथ इन किस्मों को अलग एक एकड़ में लगाएंगे व इससे होने वाली पैदावार को बीज बैंक में जमा करेंगे। फिर, वृहद स्तर पर वह बीज किसानों को उचित दामों पर दिए जाएंगे।
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इनका कहना है
प्रोजेक्ट के तहत काम चल रहा है। कृषि विशेषज्ञ व वैज्ञानिक समय-समय पर वर्कशॉप्स आयोजित कर किसानों को देशी फसलों व तकनीकी ज्ञान दे रहे है।
प्रो बीआर चौधरी, कुलपति
कृषि विवि
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स्थानीय फसलों की लुप्त किस्मों पर शोध चल रहा है। अच्छे परिणाम आने के बाद ही, इस वर्ष इन फसलों के करीब 250 किलो बीज किसानों को वितरण किए है।
डॉ बनवारीलाल, परियोजना अधिकारी
जेफ
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