जोधपुर. शीतकाल में हिमाच्छादित देशों से हिमालय पार करते हुए थार मरुस्थल में बसे जोधपुर जिले के खींचन में 6 माह के प्रवास के लिए आने वाले डेमोसिल क्रेन कुरजां ने अब तक रिकॉर्ड तोड़ दिया है। जोधपुर व पाली जिले में बर्ड फ्लू की दहशत के बीच अकेले खींचन में 35 हजार पक्षियों ने समय पूर्व ही डेरा डाल दिया है। उत्तरी रूस, उक्रेन तथा कजाकिस्तान में जब बर्फ जमने लगती है तो सारस प्रजाति के सदस्य कुरजां हजारों की तादाद में समूह के रूप में जोधपुर जिले के खींचन में पड़ाव डालती है। अब तापमान में गिरावट के साथ अब प्रतिदिन पक्षियों की बढ़ती संख्या देश के पर्यटकों को मरुधर आने का संदेश भी दे रही है।
रहस्मय है कुरजां का खींचन पड़ाव
कुरजां पक्षियों का हजारों मील का सफर का तय कर हर साल शीतकाल में हजारों की संख्या में अकेले जोधपुर जिले के खींचन में ही पहुंच कर छह माह तक पड़ाव डालना पक्षी विशेषज्ञों के लिए रहस्मय पहेली है। कुछ लोग इसे कुरजां के प्रति संरक्षण एवं सुरक्षा का भाव मानते है जबकि पूरे खींचन में एक दो अपवाद छोड़कर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है। कुछ लोग खींचन की माटी में चूने की मात्रा उपस्थिति और तालाबों में पानी भरा रहने को आकर्षण मानते है ।
अलग अलग रूट से पहुंचती है भारत
कजाकिस्तान, मध्य एशिया से कुरजां का समूह ,अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान होते हुए गुजरात व राजस्थान पहुंचती है। कई हिमालय पार कर भारत के विभिन्न राज्यों में पहुंचती है। खींचन के बुजुर्ग लोगों का कहना है कि 1930 में मात्र 100 से 150 कुरजां पहुंचती थी जो वर्तमान में बढ़कर 35 हजार से अधिक होने लगी है। खींचन में चुग्गा डालने की प्रथा जैन समुदाय के परिवार ने सत्तर के दशक में चुग्गाघर का निर्माण करवाया था।
इम्पोर्टेड बर्डस संरक्षित क्षेत्र में टॉप
पक्षी विशेषज्ञ राजस्थान के कुल 24 जगहों के इम्पोर्टेड बर्डस संरक्षित क्षेत्र में जोधपुर जिले के खींचन को कुरजां के लिए सर्वाधिक उपयुक्त और सुरक्षित मानते है।
समय की पाबंद कुरजां के पड़ाव स्थलों पर ड्रॉन उड़ाने पर सख्ती की जरूरत
समय की पाबंद कुरजां की दिनचर्या सूर्योदय के साथ आरंभ होती है। पश्चिम, उत्तर एवं पूर्व दिशा से समूह के रूप में आस पास के रेतीले टिबों पर एकत्रित होने के बाद करीब 8 बजे चुग्गा घर पहुंचना आरंभ होती है। डरपोक और शर्मीले मिजाज के पक्षियों पर तेज हवा, पर्यटकों की आवाजाही, मौसम में बदलाव, कोहरा छाया रहने पर उनकी दिनचर्या और समय में करीब आधे से एक घंटे तक का आंशिक बदलाव होता है। कुरजां के शीतकालीन प्रवास की हर गतिविधियों पर वर्षो से देखरेख करने वाले सेवादार पक्षी प्रेमी सेवाराम माली ने बताया की कुरजां ने पिछले कई सालों का रिकार्ड तोड़ा है। अब चुग्गाघर फुल होने लगा है। चुग्गाघर के आस पास के जलाशयों की सफाई यदि हो जाऐ तो कुरंजा की संख्या एक नया इतिहास लिख सकती है। फिलहाल तो कुरजां की संख्यां 35 हजार हो चुकी है और लगातार बढ़ रही है।
पक्षियों की तस्वीरे लेने के लिए ड्रॉन उड़ाने पर सख्ती की जरूरत है इससे पक्षी भयभीत होते है और पुन: आने में कतराते है।
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