जोधपुर. ग्रह योगों के साथ नक्षत्रों के संयोग भी अलग - अलग प्रकार से बनते रहते हैं। विशेषकर तब जब कोई खास त्योहार का समय चल रहा हो। ऐसी स्थिति में परम्परानुसार खरीदारी करने का यह एक विशेष संयोग माना जाता है इसके अलावा यह भी मान्यता है कि जब इस प्रकार का दिव्य संयोग बनता हो तो खरीदारी करना शुभ है। वर्ष 1961 के बाद स्वामी व उप स्वामी के रूप में शनि व बृहस्पति साथ-साथ आने से छह दशक बाद ग्रह युति का संबंध बन रहा है। प्रमुख ज्योतिषियों के अनुसार गुरुवार सुबह 9.42 बजे से पुष्य नक्षत्र की शुरुआत होगी। ग्रह गोचर में नक्षत्र मेखला की गणना अनुसार नक्षत्रों का परिभ्रमण काल भी अलग-अलग प्रकार से माना जाता है। इस दृष्टि से देखें तो गुरुवार के दिन पुष्य नक्षत्र का योग बनना गुरु-पुष्य योग कहलाता है। पुष्य नक्षत्र पर नए व्यापार की शुरुआत के साथ-साथ आवक जावक या आय-व्यय से संबंधित खाता के लेखन के संबंध में बही की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन बही खरीदना चाहिए।
1961 के बाद गुरु शनि की युति
ग्रह गोचर में पुष्य नक्षत्र के स्वामी व उप स्वामी अर्थात गुरु की युति छह दशक बाद बन रही है । यह युति पूर्व में 1961 में बनी थी, हालांकि यहां पर गणना नक्षत्र के स्वामियों के संबंध में की जा रही है। इस दृष्टि से इनकी युति का यह समय तकरीबन 60 वर्ष बाद बन रहा है ।
इन पर रहेगा खास प्रभाव
शनि तथा बृहस्पति से संबंधित क्षेत्र एवं इनसे जुड़े उद्योग धंधा या व्यापार व्यवसाय सेवा कार्य आदि से संबंधित क्षेत्रों में विशेष परिवर्तन भी होगा। साथ ही इनसे जुड़े सभी प्रकार के उपक्रम जैसे शनि के संबंध से देखें तो शनि इंश्योरेंस मोटर व्हीकल रजिस्ट्री दीर्घकालिक निवेश की योजना आकस्मिक लाभ की स्थिति, सरिया, सीमेंट की एजेंसी, उद्योग में निवेश की स्थिति, पेट्रोकेमिकल या ओएनजीसी से जुड़े अन्य उपकरणों पर निवेश तथा कपड़ा लकड़ी और इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स आदि पर प्रभाव माना गया है।
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