जोधपुर पर गिरे बमों पर मां चामुंडा ने अपने आंचल का पहना दिया कवच

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जोधपुर. जोधपुरवासियों में चामुंडा माता के प्रति अटूट आस्था यह भी है कि 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान जोधपुर पर गिरे बम को मां चामुंडा ने अपने आंचल का कवच पहना दिया था। किले व जोधपुर के कुछ हिस्सों पर कई बम गिराए गए लेकिन कोई जनहानि या नुकसान नहीं हुआ। जोधपुर शहरवासी इसे आज भी मां चामुण्डा की कृपा ही मानते हैं।

जोधपुर के मेहारानगढ़ के मां चामुण्डा मंदिर की मूर्ति को जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने 563 साल पूर्व मंडोर से लाकर स्थापित किया था। चामुंडा मूलत: परिहारों की कुलदेवी और राठौड़ों की इष्टदेवी है । राव जोधा ने जब मंडोर छोड़ा तब चामुंडा को अपनी इष्टदेवी के रूप स्वीकार किया था। किले में 9 अगस्त 1857 को गोपाल पोल के पास अस्सी हजार मण बारूद के ढेर पर बिजली गिरने के कारण विस्फोट के समय राव जोधाकालीन मंदिर क्षत विक्षत हो गया लेकिन मूर्ति अपने स्थान पर यथावत सुरक्षित रही। तबाही इतनी भीषण थी इसमें 300 से अधिक लोग मारे गए थे। उस समय जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह बालसमंद महल में थे। महाराजा तख्तसिंह ने मुख्य मंदिर का पुन: विधिवत निर्माण कार्य करवाया था। मंदिर में मां लक्ष्मी, मां सरस्वती व बैछराजजी की मूर्तिया स्थापित हैं। बैछराजजी की मूर्ति जिनकी सवारी मुर्गे पर उसे महाराजा तख्तसिंह अहमदनगर से लेकर आए थे।

मंदिर में खत्म हो गई कई परम्पराएं
तेरह साल पूर्व 30 सितम्बर 2008 को मेहरानगढ़ में हुई दुखान्तिका के बाद मंदिर में कई परम्पराएं बदल चुकी है। दुखान्तिका में 216 लोग काल कवलित हुए थे। सालमकोट मैदान में लगने वाला नवरात्रा मेला व निज मंदिर की परिक्रमा भी बंद कर दी गई है। यहां नवरात्रा की प्रतिपदा को महिषासुर के प्रतीक भैंसे और खाजरू की बलि देने की परम्परा थी जो रियासतों के भारत गणराज्य में विलय तथा पशु क्रूरता अधिनियम लागू होने के बाद बंद कर दी गई। चैत्रीय व शारदीय दोनों ही नवरात्रा में पहले सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक मां चामुण्डा मंदिर दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता था लेकिन विगत दो साल से नवरात्र में कोरोना गाइडलाइन के कारण मंदिर में दर्शनार्थियों के लिए बंद रखा गया है।



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