कायलाना झील की व्यथा... पिछले 15 साल से ‘कोहनी के लगाया गुड़’

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राजेश दीक्षित/जोधपुर. आज हमारा कायलाना जाना हुआ। कायलाना के सौंदर्य के देख हर बार की तरह मोहित हो गए। तारीफ के पुलिंदे बांधने लगे। हम बोले...अरे वाह! कितनी शानदार जगह है। इसका तो विकास होना चाहिए। बस यह सुनना था कि कायलाना झील आंखें तरेरते हुए बोली...अरे अब तो शर्म करो। बहुत हो गया...विकास की बातें सुनते-सुनते। मैं कई वर्षों से ये बातें सुनते हुए थक चुकी हूं। लो, आपको भी सुना देती हूं अपनी पीड़ा।

वर्ष २००८ में जेडीए ने ‘कायलाना लेक प्रोजेक्ट’ बनाया था। उस समय करीब ५४५.५० लाख रुपए में मेरा विकास करना था, लेकिन मामला खटाई में पड़ गया। इसके बाद वर्ष २०१२ में नेशनल लेक कंजर्वेशन के तहत केंद्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय को कायलाना प्रोजेक्ट का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन क्या हुआ? उदाहरण दिया गया कि जैसे उदयपुर में नेशनल लेक कंजर्वेशन के तहत झीलों का विकास हुआ है, ऐसा ही विकास यहां भी करेंगे। खैर...यह मामला ठंडा पड़ गया। इसके बाद जनवरी-फरवरी २०१५ में कायलाना लेक प्रोजेक्ट फिर बनाया गया। इस बार विकास के लिए कीमत बढ़ाकर ९.२७ करोड़ का प्रोजेक्ट बना डाला। यहां भी विकास की खूब बातें हुई। इसके बाद न जानें कब व कितने प्रोजेक्ट आए, सच में मुझे भी नहीं पता। कभी मेरे चारों तरफ २५ करोड़ की लागत से ६.५ किलोमीटर की सडक़ें बनाने की बातें होती हैं तो कभी डायर्वसिटी पार्क के सपने, तो कभी सिद्धनाथ तक रोप वे। सच तो यह है कि अब मैं भी सुनने-सुनते थक गई हूं।

शहरवासी कहते हैं कि मुख्यमंत्री का गृहनगर है। जल्दी विकास होगा। कभी-कभी मैं भी इन ‘झूठे दिलासों’ में खो जाती हूं। हां, जब ३० नवम्बर २०२० को नगरीय विकास मंत्री शंाति धारीवाल जोधपुर आए तो एक उम्मीद फिर जगी। उन्होंने भी एक अच्छा खासा सपना दिखाया। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आइलैंड पर मार्बल स्ट्रक्चर, वॉटर फॉल, और पता नहीं क्या-क्या? पिछले दस सालों से वाटर एक्टिविटी की बातें भी खूब सुन चुकी हूं।
कायलाना की बातें सुनकर हमारी बोलती बंद हो गई। लेकिन कायलाना का बोलना या यूं कहें कि गुस्सा जारी ही था। वो बोली...सच तो यह है कि आखलिया-सूरसागर रोड से यहां आने तक न तो पर्याप्त परिवहन हैं और न ही मुख्य रोड तक लाइट की व्यवस्था। गंदगी यहां पसरी रहती है। सुलभ कॉम्प्लेक्स के लिए पर्यटक भटकते हैं। बुरी छवि लेकर ही जाते हैं। हर साल १२ लाख देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। स्मार्ट सिटी के सपनों की बीच छवि धूमिल ही हो रही है।

अब तो कभी-कभी रोना भी आता है जब लोगो से सुनती हूं कि मैं तो ‘सुसाइड पाइंट’ बनती जा रही हूं। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है। सभी को हिमालय का मीठा पानी ही पिलाती हूं। अब तो ‘कोहनी के गुड़’ लगाना बंद करो। पिछले १० साल में किसी भी विभाग ने मेरे पर एक रुपया भी खर्च किया हो तो बता दो। करोड़ों तो बहुत दूर की बात है, आखिर कब होगा मेरा कायाकल्प।



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