एम्स में भले ही डॉक्टर को दिखा दो, लेकिन दवाई लेने आना पड़ता है एमजीएच-एमडीएम

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जोधपुर. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जोधपुर की स्थापना के नौ साल बाद भी अब तक वहां सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार का मेडिकल स्टोर नहीं खुल पाया है। जिसके चलते राज्य सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स को एम्स ओपीडी में डॉक्टरों से जांच करवाने के बाद दवाई लेने के लिए मथुरादास माथुर व महात्मा गांधी अस्पताल आना पड़ता है। यदि कोई विशेष दवाई एम्स के बाहर स्थित दवाइयों की दुकान में ही उपलब्ध है तो सहकारी भण्डार की दवा की दुकान से एनओसी लेकर फिर से एम्स जाना पड़ता है। एम्स कैंपस में केवल अमृत फार्मेसी संचालित हो रही है। अधिकांश मरीज व उनके परिजन एम्स परिसर के बाहर स्थित निजी दवाइयों की दुकानों से महंगी दवाइयां खरीदने को मजबूर हैं।

औषधि विभाग नहीं दे रहा लाइसेंस
सहकारी भण्डार ने गत वर्ष कोविड के दौरान एम्स परिसर के बाहर नगर निगम की जमीन पर मेडिकल स्टोर खोलने के लिए आवेदन किया और स्वीकृति मिल गई। दवा की दुकान छह महीने पहले बनकर तैयार हो चुकी है लेकिन औषधि नियंत्रण विभाग लाइसेंस नहीं दे रहा है। औषधि विभाग का कहना है कि निगम ने अस्थाई दुकान की अनुमति दी है जबकि भण्डार ने छीणे लगाकर स्थाई निर्माण कर दिया है। केवल इसी शर्त के कारण दवा काउंटर शुरू नहीं हो रहा है।

एम्स ने मना किया, मंत्री को भी बताया
सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एम्स परिसर में मेडिकल स्टोर शुरू करने के लिए आवेदन किया था लेकिन एम्स ने परिसर में अनुमति नहीं दी। राज्य सरकार के कार्मिकों व परेशान पेंशनर्स की मांग पर यह समस्या केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को भी बताई गई लेकिन अभी तक इसका समाधान नहीं हुआ है।

पेंशनर्स को रेलवे स्टेशन आना पड़ता है
एम्स में सहकारी मेडिकल स्टोर नहीं होने से सर्वाधिक बुजुर्ग पेंशनर्स को होती है। उन्हें दवाइयां और एनओसी लेने के लिए कई बार रेलवे स्टेशन स्थित राजीव गांधी सहकार भवन आना पड़ता है।

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‘एम्स ने अपने परिसर में हमें मेडिकल स्टोर खोलने की अनुमति नहीं दी। परिसर के बाहर निगम की जमीन पर हम केबिन काउंटर खोलना चाहते हैं लेकिन वहां औषधि विभाग छह महीने से लाइसेंस अटकाए बैठा है।’
- मो. हारुन बेलिम, महाप्रबंधक, जोधपुर सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार

‘नगर निगम ने भण्डार को दवा दुकान के लिए अस्थाई अनुमति दी है। फिर भी हमने निगम से पत्राचार किया लेकिन निगम ने कोई जवाब नहीं दिया इसलिए लाइसेंस नहीं दिया गया।’
- राकेश वर्मा, सहायक औषधि नियंत्रक जोधपुर



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