जोधपुर।
कभी दिन में दो घंटे तो कभी पूरी रात। कोई छोटा गांव है तो वहां खेती की बिजली में भी कटौती। कुछ ऐसी स्थिति इन दिनों गांवों की हो रखी है। एक तो बिजली उत्पादन यूनिट का बंद होना, दूसरा कोयले की कमी और उस पर मौसम की मार...। सभी ने एक बार साथ विपरित माहौल बनाकर बिजली व्यवस्थाओं की परीक्षा शुरू कर दी है। अघोषित तौर पर बिजली काटनी पड़ रही है। पत्रिका ने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से ग्राउंड रिपोर्ट करवाई तो कुछ ऐसी हकीकत सामने आई। फलोदी क्षेत्र : दिन में पांच से सात बार अघोषित कटौती हो रही है। दिन में 2 से चार घंटे तक बिजली काटी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में छह से आठ घंटे तक औसतन बिजली गुल रहती है।
देचू क्षेत्र : कस्बे व गांव में बिजली ट्रिपिंग होना आम हो गया है। कृषि क्षेत्र में बिजली छह घंटे दी जाती है। लेकिन हर दस मिनट में ट्रिपिंग समस्या होती है।
लोहावट क्षेत्र - घरेलू बिजली व कृषि बिजली में 8 से 10 बार ट्रिपिंग होती है। 24 घंटे में औसतन दो से तीन घंटे तक बिजली गुल रहती है।
बिलाड़ा क्षेत्र - शहरी क्षेत्र में ट्रिपिंग होना आम है। औसतन एक घंटा या कई बार इससे भी ज्यादा कटौती होती है।
पीपाड़ क्षेत्र - दिन में तीन से चार बार बिजली जाना आम है। चुनाव है, इसलिए थोड़ा ट्रिपिंग भी कम हो रही है।
लूणी क्षेत्र - चुनावी सीजन के कारण थोड़ी मेहरबानी है, लेकिन वोल्टेज रेगुलेट करने के लिए दिन में तीन से चार बार ट्रिपिंग होती है।
बालेसर-बेलवा क्षेत्र - शेरगढ, बालेसर, बेलवा क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में दिन में तीन से चार बार बिजली जाना आम है। बिजली वापस भी आधा या एक घंटे तक नहीं आती। कृषि बिजली को कई बार दो से तीन घंटे तक बंद रहती है।
ऐसे समझिये बिजली संकट
- सभी बिजली उत्पादन यूनिट के काम नहीं करने से बिजली जितनी चाहिए उतनी नहीं मिलती। ऐसे में जिस क्षेत्र में वोल्टेज कम होता है, वहां बिजली ट्रिपिंग कर कुछ समय के लिए सप्लाई काट दी जाती है।
- विंड एनर्जी का औसन उत्पादन नीचे आया है, उसका कारण अभी हवा का भी अनुकूल न होना है।
- बारिश सीजन में एग्रीकल्चर बिजली की जरूरत सबसे कम होती है, लेकिन इस बार बारिश कम हुई और ट्यूबवेल चलने से कृषि में डिमांड काफी अधिक है।
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