NAND KISHORE SARASWAT
जोधपुर. छीतर पत्थर के दोहन के बाद शून्य हो चुकी पत्थरों की खानों के मलबों का पहाड़ वन क्षेत्रों और झीलों के किनारे बढ़ते जा रहे है। इससे झीलों और जलाशयों का जलग्रहण क्षेत्र भी प्रभावित होने लगा है। सूरसागर, कालीबेरी, मंडलनाथ रोड, रावटी, बेरीगंगा, बड़ली, बड़ा भाखर सहित शहर के खनन क्षेत्रों में मलबों के ढेर पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते है। वन क्षेत्रों में खनन मलबों का निवारण नहीं होने से क्षेत्र में विचरण करने वाले वन्यजीवों की दिनचर्या पर विपरित प्रभाव पड़ रहा है।
मलबे में पौधे की योजना
कागजों में दफन करीब ढाई दशक पूर्व केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान काजरी के वैज्ञानिकों ने खानों से निकलने वाले मलबे में हरियाली लाने का दावा किया था । भारत अमरीका संयुक्त परियोजना के तहत काजरी वैज्ञानिकों ने जोधपुर के खनन क्षेत्रों को चयनित किया था और पत्थर के खानों से निकलने वाले मलबे में परीक्षण के तौर पर पेड़ पौधों को उगा कर खनन क्षेत्र के पुनरुत्थान के प्रयास भी शुरू किए थे । लेकिन धीरे धीरे यह प्रयास कागजों में ही दफन होकर रह गए । किसी भी खनन मलबे में दूर दूर तक पौधों के नामों निशां तक नजर नहीं आते है। खनिज विभाग के नियमानुसार कैचमेंट एरिया और सड़क से 45 मीटर की दूरी पर खनन करने का प्रावधान है लेकिन खनन के अधिकांश क्षेत्रों में इन नियमों की अवहेलना हो रही है। खनन का मलबे से कायलाना जलाशय, बड़ली तालाब का कैचमेंट एरिया भी प्रभावित होने लगा है।
अधिकारियों ने कभी मौके पर जाकर देखा तक नहीं
खनन मलबों से प्राकृतिक शुष्क वनों और वज्रदंती व अश्वगंधा जैसी औषधियों का विनाश, सरिसृप और छोटे जीव जंतुओं के प्राकृतवास, प्रकृति और पर्यावरण की तबाही हो रही है। वनविभाग और खनन विभाग के अधिकारियों ने दशकों से मौके पर जाकर कभी देखने तक की जरूरत ही नहीं समझी जिसका नतीजा मलबों के पहाड़ के रूप है। जिला प्रशासन, वनविभाग और खनन विभाग की नियमित संयुक्त कार्रवाई से ही पर्यावरण बचाने की दिशा में कुछ सुधार हो सकता है।
रामजी व्यास, पर्यावरणविद जोधपुर
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