हनुमान लंगूरों के प्राकृतिक आवास खत्म होने से प्रजनन दर पर असर

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?

NAND KISHORE SARASWAT

जोधपुर. भोगिशैल परिक्रमा मार्ग के विनाश, खदानों में विस्फोट, पहाडिय़ों पर अंधाधुंध कब्जे, प्राकृतिक जलस्रोतों के बर्बादी के कारण लंगूरों की प्रजनन दर लगातार प्रभावित हो रही है। मंडोर, भद्रेशिया, चोखा, मोकलावास क्षेत्र में हनुमान लंगूरों के विभिन्न प्राकृतवास में बढ़ती खनन गतिविधियां घातक साबित हो रही है। खनन के दौरान विस्फोट उपयोग का सीधा असर लंगूरों की प्रजनन क्षमता पर पड़ा है। पिछले दो दशकों की तुलना में हनुमान लंगूरों की प्रजनन दर में दस प्रतिशत तक कमी आई है। मंडोर क्षेत्र में दईजर की प्राचीन गुफाओं में पुरानी सभ्यताओं के अवशेषों के आस पास खनन से लंगूरों के प्राकृतिक आवास सहित कई प्रकार के संकटग्रस्त प्रजातियां का अस्तित्व भी खतरे में पड़ रहा है। हनुमान लंगूरों के आश्रय स्थलों के आस-पास पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पारम्परिक आवास स्थल और प्राकृतिक भोजन तक नष्ट होते जा रहे हैं। यही कारण है कि लंगूरों को रिहायशी इलाकों की ओर पलायन बढ़ रहा है।

50 टोले में 2500 हनुमान लंगूर

शहर के आस-पास करीब 50 टोले में 2500 से अधिक हनुमान लंगूर हैं। शहर के दईजर, बेरीगंगा, निम्बा निम्बड़ी, मंडोर, बालसमंद, चोखा, कागा शीतला माता मंदिर, चांदपोल, गूंदी का मोहल्ला, रानीसर, भूतनाथ, कायलाना, भीम भड़क, बीजोलाई, सिद्धनाथ, चौपासनी, कदमखंडी, भद्रेशिया, अरना-झरना व बड़ली क्षेत्र में करीब 50 हनुमान लंगूरों को टोले है जिनमें 37 मादाओं के टोले व 16 सर्व नर दल है।

तीन गुणा होने में लगे पचास साल

पांच दशक पूर्व 1970 में जोधपुर में हनुमान लंगूरों की आबादी 800 के करीब थी जिसे ढाई हजार संख्या तक पहुंचने में 50 साल का समय लगा। वर्तमान में इनके परम्परागत आवासों में माइनिंग और अतिक्रमण बढ़ रहे है जिसे रोकने की जरूरत है।

प्रो. लालसिंह राजपुरोहित -पर्यावरणविद व जेएनवीयू के पूर्व प्राणी विज्ञान विभागाध्यक्ष



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/3BjiC4R
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment