कोविड के फ्रंट लाइन डॉक्टर: न रात की नींद, न दिन का चैन

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जोधपुर. गत एक महीने से शहर में कोराना ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अस्पतालों के बेड फुल हैं। ऑक्सीजन नहीं है। जरुरी दवाइयों की कमी है। डॉक्टरों को रात-दिन काम करना पड़ रहा है। पत्रिका ने चार डॉक्टरों से पिछले एक महीने की दिनचर्या और अनुभव के बारे में बात की। चिकित्सकों की हालत यह है कि वे प्रोपर नींद तक नहीं ले पा रहे हैं। कोई चार घंटे की नींद तक नहीं ले पा रहे हैं।

रात को 9.30 बजे 1.30 बजे वाला लंच कर रहे थे
(पत्रिका रिपोर्टर ने गत रात 9.30 बजे जब डॉ पीके खत्री को फोन लगाकर हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि लंच कर रहा हूं। आज काम बहुत ज्यादा था। मेडिकल कॉलेज में केवल नाश्ते से ही काम चलाना पड़ा।)

मैं रात को 3 बजे सोता हूं। सुबह 7-8 बजे घर का काम करने के बाद सुबह 10 बजे कॉलेज पहुंच जाता हूं। हम रोज 4 हजार मरीजों के सैंपल की जांच करते हैं। मेरे पास 60 चिकित्साकर्मियों की टीम है। लैब 24 घण्टे चल रही है। कोविड का सैंपल देने वाले हर व्यक्ति को चिंता रहती है कि उसकी जांच रिपोर्ट कब आएगी इसलिए हम लोग जी जान से लगे रहते हैं। घरवाले थोड़े नाराज रहते हैं लेकिन वे हमे प्रोत्साहित भी करते हैं।
-डॉ पीके खत्री, इंचार्ज, वायरल रिसर्च डायग्नोस्टिक लेबोरेट्री, डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज जोधपुर

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97 के दादा, 92 की दादी, फिर भी कोविड प्रायोरिटी
मैं सुबह 6.30 उठ जाता हूं और योगा वगैरह करके साढ़े आठ बजे तक अस्पताल आ जाता हूं। अस्पताल आने के बाद समय का कोई ठिकाना नहीं रहता। वार्डों में दिनभर मरीजों की देखरेख, टेलिमेडिसिन के जरिए घर बैठे मरीजों को परामर्श, सरकार द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों की पालना में रात के 10 बज जाते हैं। घर के आने के बाद भी फोन चालू रहता है। स्विच ऑफ भी नहीं कर सकता। रात को 2 बजे सोता हूं। केवल चार घण्टे की नींद हो पाती है। घर में 97 साल के दादा और 92 साल की दादी जी है। थोड़ी चिंता रहती है लेकिन घरवाले समझते हैं। कोविड मरीजों देखभाल ही पहली प्राथमिकता है।

डॉ विकास राजपुरोहित, ट्रोमा सेंटर इंचार्ज, कोविड नोडल अधिकारी व समन्वयक, एमडीएम अस्पताल

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मेरे ही अस्पताल मेरे खास दोस्तों की मौत हो गई, खराब लगता है

हमनें पिछले एक महीने में 110 प्रतिशत काम किया है। सुबह 9 बजे आता हूं और रात 8 बजे घर जाता हूं। उसके बाद सारा काम फोन पर चलता है। नींद 4-5 घण्टे की ही होती है। मेरी ही अस्पताल मेरे कई खास दोस्तों की कोविड से मौत हो गई। कइयों के सिटी स्कैन स्कोर 22 से 25 थे। बहुत खराब लगता है। फिर भी जिंदगी है। चलानी पड़ेगी। मेरे घर में भाभी प्रेग्नेंट है। हमारी वजह से उन्हें कोई तकलीफ नहीं हो इसलिए उन्हें घर में ही एक अलग कमरे में आइसोलेट करके रखा है। खाना भी उनको वहीं दिया जाता है। कुल मिलाकर मेरा प्रयास यही है कि कोविड से किसी को भी कोई तकलीफ नहीं हो, मैं 24 घण्टे हॉस्पीटल के लिए तैयार रहता हूं।
-डॉ सुयश गोयल, प्रभारी, गोयल अस्पताल (निदेशक डॉ आनंद गोयल के पुत्र हैं।)

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सपने लेने के लिए नींद भी आना जरुरी है

पिछले एक महीने में न दिन का पता है और न रात का। संडे-मंडे कुछ नहीं है। रात को 3-4 घण्टे ही नींद हो पाती है। इस एक महीने में बेड बढ़ाकर 200 से 500 तक ले आई लेकिन फिर भी बेड कम पड़ रहे हैं। हमने पूरी ताकत झोंक रखी है। रात को भी हर एक डेढ़ घण्टे में मोबाइल की घण्टी आ जाती है। ऐसे में सोना तो हो ही नहीं पाता है। सपनों के लिए नींद भी तो जरुरी है। (पत्रिका रिपोर्टर के यह पूछने पर कि आजकल सपने कैसे आते हैं, पर जवाब दिया।) मेरे पति भी डॉक्टर है इसलिए अस्पताल व परिवार में बेहतर सामंजस्य हो जाता है। घरवाले भी मेरी हार्ड ड्यूटी समझते हैं और मदद करते हैं।
-डॉ राजश्री बेहरा, अधीक्षक, महात्मा गांधी अस्पताल



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