मेडिकल बोर्ड सामने लाएगा विकलांगता प्रमाण पत्र की सच्चाई

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जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने निचले अंगों में 40 प्रतिशत से ज्यादा विकलांगता का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बावजूद नौ अभ्यर्थियों को पशुधन सहायक भर्ती प्रक्रिया-2018 से बाहर करने के मामले में एक मेडिकल बोर्ड गठित कर सभी का चिकित्सकीय परीक्षण करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने दो टूक कहा कि विकलांगता प्रमाण पत्र के संबंध में याचिकाकर्ताओं के दावे गलत पाए गए तो न केवल उनके खिलाफ, बल्कि उन चिकित्सक या सक्षम प्राधिकारियों के खिलाफ भी उचित कार्रवाई की जाएगी, जिन्होंने ऐसे प्रमाण पत्र जारी किए थे।
न्यायाधीश दिनेश मेहता ने नेमाराम सहित नौ याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं की सुनवाई के बाद डा.संपूर्णानंद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को सभी अभ्यर्थियों की लोकोमोटर विकलांगता का आकलन करने के लिए कम से कम दो आर्थोपेडिक विशेषज्ञों, (जिनमें से एक प्रोफेसर स्तर का होना चाहिए) का मेडिकल बोर्ड गठित करने को कहा है, जिनको विशेषतौर पर पांवों में अभ्यर्थियों की विकलांगता के संबंध में प्रतिशतता बतानी होगी। सभी अभ्यर्थियों को 26 अप्रैल को सुबह दस बजे मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित रहना होगा। याची की ओर से अधिवक्ता वरदा राम चौधरी ने कहा कि भर्ती अधिसूचना में कहा गया था कि जिस अभ्यर्थी की 40 प्रतिशत से अधिक लोकोमोटर विकलांगता एकल निचले अंगों में होगी, उसे आरक्षण का लाभ मिलेगा। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उनकी लोकोमोटर विकलांगता 40 प्रतिशत से अधिक है और सभी नियुक्ति के लिए पात्र हैं। उन्होंने कहा कि सभी के प्रमाण पत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए हैं, जबकि राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता अनिल कुमार गौड़ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के दावे सही नहीं है। कुछ अभ्यर्थियों की विकलांगता 4 प्रतिशत ही है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यह विरोधाभास है तो न राज्य इस तरह की विसंगति की ओर आंख मूंद सकता है और न ही न्यायालय एक नजर रखने वाला बन सकता है।



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