जोधपुर. भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सौजन्य एवं राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी के तत्वावधान में सात दिवसीय 'पाण्डुलिपि पठन एवं संरक्षणÓ कार्यशाला के दूसरे दिन डॉ. राजेन्द्र कुमार ने राजस्थान के आर्थिक इतिहास के प्रमुख स्रोत 'जगात बहीÓ और उसके लिपि ज्ञान से सम्बन्धित व्याख्यान प्रस्तुत किया। आर्थिक व्यवहार से सम्बन्धित विवरण जिन बहियों में प्राप्त होता है उन्हें जगात बही कहा गया। डॉ. राजेन्द्र ने कहा कि लिपि ज्ञान के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का ज्ञान आवश्यक है। कार्यशाला में प्रो. जमनेश कुमार ओझा ने बेदला ठिकाने की 'पड़ाखा बहीÓ पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह बही दैनिक जमा खर्च की बही है। इसमें वैवाहिक रीति-रिवाज खान-पान, वेशभूषा, आभूषण आदि के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। उन्होंने कहा कि ठिकानों का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास लेखन की दृष्टि से बहियें उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। समिति राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी जोधपुर के अध्यक्ष चक्रवर्तीसिंह जोजावर ने पाण्डुलिपि विशेषज्ञों को स्मृति चिह्न प्रदान किए। संस्थान के सहायक निदेशक डॉ. विक्रम सिंह भाटी पाण्डुलिपि पठन में पट्टा बहियें, हकीकत बहियें, सनद बहियें, रूक्के-परवानें पर पठन के कार्य से शोधार्थियों को अवगत कराने के साथ ही पाण्डुलिपि पठन का प्रायोगिक अभ्यास के बारे में बताया। संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. सद्दीक मोहम्मद ने सत्र का संचालन किया। कार्यशाला के दौरान कोविड-19 के दिशा-निर्देशों की पालना की गई।
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