जोधपुर. पर्यावरण संतुलन के महत्वपूर्ण घटक वनभूमि का अस्तित्व लगातार खत्म होने के बावजूद वनविभाग के साथ जिला व पुलिस प्रशासन के अधिकारी वनभूमि बचाने के प्रति बिलकुल भी संवेदनशील नहीं है। वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद वनभूमि पर अंधाधुंध अतिक्रमण और अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से बड़ी कार्रवाई किए डेढ़ दशक बीत चुका है। वनविभाग के अधिकारी जोधपुर के अलग अलग वनखंड में वनभूमि को अतिक्रमणमुक्त करने एवं अवैध खनन रोकथाम के लिए पुलिस उपायुक्त मुख्यालय कई बार लिखित में भी लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति बिगडऩे की आशंका के चलते जाप्ता उपलब्ध कराने की गुहार लगा चुके है लेकिन पुलिस इमदाद के लिए हर बार टालमटोल रवैया अपनाया गया। वनक्षेत्रों में खनन और अतिक्रमण को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करने वाले जिला प्रशासन के अधिकारियों की बेरूखी के कारण अतिक्रमियों के हौसले बुलंद हो रहे है।
सब कुछ लूट जाने का खतरा
वनभूमि को समय पर राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं करने से वनभूमि को दूसरे पक्षकारों को आवंटित करने का खतरा लगातार बढ़ा हैं। वनभूमि पर अवैध खनन, अतिक्रमण, कच्ची बस्तियां बसने जैसे वन अपराध होने पर वनविभाग नियमपूर्वक कार्रवाई करने से भी वंचित हैं।
५०० हैक्टेयर वनभूमि पर कब्जा, जोधपुर में अधिकारी ही नहीं
जोधपुर शहर की सीमा में सात वनखंडों में आबाद ५० बस्तियों में करीब २५ हजार से अधिक कब्जे हो चुके है। अतिक्रमण की शृंखला निरंतर जारी है। वनविभाग सहित अन्य सरकारी विभाग के अधिकारी व कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना अतिक्रमण संभव नहीं है।
जेडीए के समानान्तर वनभूमि पर काटी जा रही कॉलोनियों से शहर की लाइफ लाईन की तबाह होने के लिए कोई भी विभाग जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े शहर में उपवन संरक्षक व सहायक वन संरक्षक का तबादला हुए एक महीना बीत चुका है लेकिन पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग के पद भरने के लिए कोई दिलचस्पी नहीं है।
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