गजेन्द्र सिंह दहिया/जोधपुर. इसरो (ISRO) की ओर से अगस्त 2019 में चंद्रमा पर भेजे गए दूसरे चंद्रमिशन चंद्रयान-2 का लैण्डर (Lander) विक्रम और रोवर (Rover) प्रज्ञान अभी भी चांद पर है। एक साल में प्रज्ञान ने चंद्रमा की सतह पर एक किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर ली। यह दावा इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च ग्रंथालय में दिसम्बर 2020 में छपे एक शोध पत्र में देश के एक उत्साही अंतरीक्ष परिवार ने किया है। लुधियाना निवासी इम्यूनोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ हरिमोहन सक्सेना, उनके छोटे भाई रिटायर्ड बैंकर बीकानेर निवासी जगमोहन और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर में रिसर्च स्कोलर डॉ हरिमोहन की पुत्री प्रियंका सक्सेना ने छह महीने तक शोध के बाद नासा (NASA) के उस दावे को खारिज कर दिया कि लैण्डर विक्रम चंद्रमा की सतह के सम्पर्क में आते ही टुकड़ों में बंट गया था।
नासा के दावे को नासा की वेबसाइट से खारिज
डॉ. हरिमोहन कहते हैं कि वे और उनके भाई ने विक्रम की खोज प्रारंभ की। इसके लिए नासा की वेबसाइट LROC का अध्ययन किया। इस पर नासा रियल टाइम अपडेट करता है। वेबसाइट में दक्षिणी धु्रव पर एक ऑब्जेक्ट दिखाई दिया था। प्रियंका इमेज प्रोसेसिंग में पीएचडी कर रही है। प्रियंका ने विशेष सॉफ्टवेयर के जरिए फोटो की डिहेजिंग और डिनॉइजिंग की। जिसके बाद विक्रम स्पष्ट नजर आ गया।
विक्रम का रैंप खुला, 1 किमी दूर मिली बघी
डॉ हरिमोहन ने बताया कि फोटो में विक्रम का दरवाजा खुलकर रैंप बाहर आया हुआ मिला। इसका अर्थ छह पहियों की बघी प्रज्ञान बाहर निकल गई थी। इसके बाद प्रज्ञान की तलाश शुरू हुई। वह भी 1 किमी से अधिक दूरी पर मिल गया। विक्रम चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर मेंजाइनस और सिम्पेलियस क्रेटर के मध्य ही उतरा था। सक्सेना परिवार ने सिम्पेलियस क्रेटर से उसकी तलाश शुरू की थी।
उस दिन यह हुआ था
इसरो (ISRO) ने अगस्त 2019 में चंद्रयान-2 मिशन भेजा था। इसमें एक ऑर्बिटर, लैंडर विक्रम और उसके अंदर रोवर प्रज्ञान था। ऑर्बिटर के चंद्रमा की कक्षा में कुछ दिन चक्कर लगाने के बाद 6 सितम्बर को इससे लैंडर अलग होकर चंद्रमा की सतह पर बढऩे लगा। सतह से 2.1 किमी पहले इसरो का लैंडर से सम्पर्क टूट गया। रोवर प्रज्ञान इसके अंदर था।
इसरो कोई जवाब नहीं दे रहा
हमने इसरो (ISRO) को अपना शोध पत्र व फोटो भेजे हैं। वे न तो इसे स्वीकृत कर रहे हैं और न ही खारिज। नासा ने विक्रम के छोटे बिंदू के रूप में टुकड़े दिखाई थे, जबकि विक्रम मैटल का बना है और इतने टुकड़ों में नहीं बंट सकता।
-प्रियंका सक्सेना, रिसर्च स्कोलर, आइआइटी जोधपुर
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