जोधपुर।
प्रमुख मसाला फसल जीरा की प्रोसेसिंग इकाइयों की कमी, लचर विपणन व्यवस्था व टेक्स की मार के कारण यहां उत्पादित अधिकांश जीरा स्थानीय मंडियों में नहीं बिक पा रहा है। राजस्थान में पड़ौसी राज्य गुजरात से मंडी टेक्स अधिक है। मंडी टेक्स कम होने की वजह से जीरे की प्रोसेसिंग इकाइयां (प्रसंस्करण) भी गुजरात में राजस्थान से ज्यादा है इसलिए यहां की उपज वहां बिकने जाती है। जोधपुर में जीरे की विशिष्ट मंडी होने के बावजूद यहां उत्पादित होने वाली 2.50 लाख मीट्रिक टन फ सल में से केवल 20 प्रतिशत फ सल ही मंडी में बिकने के लिए आती है। यहां का 80 प्रतिशत जीरा गुजरात की उंझा मंडी में बिकने जाता है। जहां उत्पादन वहां प्रसंस्करण इकाइयां लगने से किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उंझा मंडी के बराबर जीरे के दाम मिल सकेंगे। इससे किसानों को अच्छे दामों की तलाश में गुजरात जाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी।
भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष नरेश व्यास व प्रांत प्रचार प्रमुख तुलछाराम सिंवर के अनुसार केंद्र के नए कानून से अब किसानों जहां उचित मूल्य मिलेगा, वहां फ सल बेचने की अनुमति होगी। किसान सीधे खेत में उपभोक्ता या प्रसंस्करणकर्ता को फ सल बेच सकेंगे। वहीं जीरा मंडी व्यापारियों का कहना है कि नए कृषि कानून से जोधपुर में विकसित की गई प्रदेश की सबसे बड़ी जीरा मंडी का ढांचागत विकास प्रभावित होगा व व्यापार को नुकसान होगा। मंडी के अंदर किसानों की आवक कम व व्यापार को नुकसान होगा।
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