कोरोनाकाल में भी बरकरार है 'कळदार का क्रेज

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जोधपुर. मारवाड़ में सर्वप्रथम कळ याने मशीन से तैयार होने वाले 'कळदारÓ याने सोने व चांदी के सिक्कों की मांग आज भी बरकरार है। जोधपुरी 'कळदारÓ सिक्के का वजन 11.664 ग्राम व धातु की शुद्धता होने के कारण पसंद बना हुआ है। कळदार सिक्के पूर्ण रूप से तात्कालिक धातु कीमत के होने के कारण सिक्के के वजन के बराबर उसका मूल्य पुन: मिलने की वजह से मांग बनी रही है।

कोरोना के कारण सिर्फ 300 किलो के सिक्के तैयार
देश भर में चांदी के सिक्के टंच के हिसाब से तैयार होते है और जोधपुर सर्राफा एसोसिएशन की ओर से तैयार किए जाने वाले 99 प्रतिशत शुद्ध दस ग्राम के सिक्को का मूल्य 700 रुपए है। एसोसिएशन की ओर से 5, 10,20, 50 व 100 ग्राम तक के कुल 300 किलो के सिक्के तैयार करवाए गए है। कोरोनाकाल में मार्च के बाद लगातार चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण धनतेरस पर सिक्कों की डिमांड इस बार कम होने की संभावना को देखते हुए ऐसा किया गया है।
-देवेन्द्र सिंघल, डायरेक्टर, जोधपुर सर्राफा एसोसिएशन

जोधपुरी कळदार का वजन 11.4मिलीग्राम
जोधपुरी 'कळदारÓ सिक्के में अपनाए जाने वाली शुद्ध प्रक्रिया की तर्ज पर तीन दशक पूर्व जोधपुर सर्राफा एसोसिएशन ने सिक्का विक्रय करना शुरू किया था। प्राचीन विजयशाही 'कळदारÓ सिक्के की कीमत दूसरे सिक्कों की तुलना में कुछ ज्यादा है। इसका वजन भी 11.4 मिलीग्राम है लेकिन सिक्के पुराने होने से घिसावट के कारण कुछ छीजत हो सकती है। जबकि ब्रिटीशकालीन सिक्कों का वजन करीब 11.664 ग्राम और मूल्य करीब 800 रुपए तक है। यह मूल्य क्रय करने वाले दिवस के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है।
सुरेश कुमार अग्रवाल, पूर्व सचिव, जोधपुर सर्राफा एसोसिएशन

जोधपुर में इस तरह शुरू हुआ था सिक्कों का सफर
जोधपुर महाराजा विजयसिंह के शासनकाल में सन 1780 में सिक्कों को प्रथम बार जोधपुर रियासत के लिए ढालना शुरू किया गया था । सोने के सिक्के जोधपुर और चांदी और तांबे के सिक्के पाली, सोजत, मेड़ता, नागौर और कुचामन में ढलवाए गए । सिक्कों को विजय शाही सिक्के कहते थे । सन 1856 में सिक्के एक छोर पर महारानी विक्टोरिया दूसरी तरफ महाराजा तख्तसिंह अंकित किए जाने लगा। विजय शाही सिक्कों पर पेड़ और तलवार अंकित किए जाते थे । महाराजा तख्तसिंह के समय सिक्कों पर पेड़ व तलवार का चित्र और विजयशाही सिक्कों पर पांच फूल की पत्तियां व तीर भी अंकित रहा। सन 1899 में जब मारवाड़ राज्य में अकाल पड़ा तो ब्रिटेन से अनाए मंगाए जाने के कारण चांदी के सिक्कों की कमी पड़ गई थी । उस समय जोधपुर राज्य ने चांदी के सिक्के ढालने बंद कर दिए थे । तब से ब्रिटिश सिक्कों का प्रचलन शुरू हो गया था ।



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