ओम टेलर. जोधपुर
कोरोना के कारण कम बिक्री होने से इस बार जोधपुर यानि अपने ससुराल में रावण के सैकड़ों पुतलों का दहन नहीं हो पाया। जिसके चलते पुतले बनाने के काम से जुड़े परिवारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना हैं कि कोरोन ने उन्हें कर्जदार कर दिया। अब यह बचे हुए पुतले भी कुछ माह में पड़े-पड़े खराब हो जाएंगे। स्थानीय प्रशासन कुछ मदद करें तो राहत मिले।
सड़क किनारे रह रहे परिवार के साथ शहर के पाल बालाजी मार्ग, पाली रोड मंडी चौराहा, सारण नगर बनाड़ पर सड़क किनारे कुछ परिवारों ने इस बार भी दशहरे को लेकर रावण के पुतलों का निर्माण किया था। जिसमें दो फीट से लेकर 40 फीट की ऊंचाई तक के रावण के पुतले थे। उन्हें आश थी कि इस बार अच्छी कमाई होगी। लेकिन कोरोना के चलते इस बार कम पुतले बिकने से सैकड़ों पुतले बच गए।
साहब, कोरोना ने तो हमें कर्जदार कर दिया
पाली रोड सड़क किनारे एक झोपड़ी में रहने वाले मांगीलाल ने बताया कि साहब, इस बार तो कोरोना के कारण रावण के पुतले काफी कम बिके। आधे से ज्यादा पुतले बच गए। कमाई तो दूर उल्टा कर्जदार हो गए। 50 हजार उधार लेकर पुतलों का निर्माण इस आश में शुरू किया था कि दशहरे पर अच्छी बिक्री होगी तो उधार लिए रुपए चुका देंगे। कुछ ऐसी ही कहानी पाल बालाजी मार्ग पर सड़क किनारे रहने वाली तुलसीदेवी की है। उसने बताया कि पति के साथ मिलकर वह रावण के पुतले बनाती है। लेकिन इस बार काफी कम पुतले बिके। करीब 30 पुतले बच गए है। जो कुछ ही माह में खराब हो जाएंगे। ऐसे में उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बनाड़ रोड सारण नगर के निकट सड़क किनारे पुतले बनाने वाले रमेश ने बताया कि रावण के पुतले कम बिके। ऐसे में परिवार को दो वक्त का भोजन उपलब्ध करवाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
मंडोर में है रावण का ससुराल
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार जोधपुर के मंडोर में रावण का ससुराल है। तथा मयासुर ने ब्रह्मजी के वरदान से अप्सरा हेमा के लिए जोधपुर में मंडोर का निर्माण करवाया था। मायासुर और हेमा की संतान मंदोदरी थी। मंडोर का नामाकरण मंदोदरी की वजह से हुआ। मान्यता यह भी हैं कि रावण ने मंदोदरी के साथ फेरे यही मंडोर में लिए थे।
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