जोधपुर में अजीब संयोग, यहां के पार्षद बन गए विधायक-सांसद, लेकिन महापौर के कॅरियर पर लग गया विराम

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राजेश दीक्षित

जोधपुर. यह ‘शीर्षक’ देखकर आप चौंक जरूर गए होंगे, लेकिन जोधपुर नगर निगम की राजनीति का यह अजीब संयोग है। जो पिछले ढाई दशक से अधिक समय से चला आ रहा है। जोधपुर में अब तक जितने भी महापौर व कार्यवाहक महापौर हुए , उनके राजनीतिक कॅरियर लगभग पूर्ण विराम ही लग गया। जबकि पार्षद बने कई नेता विधायक और सांसद तक बन गए। ऐसा नहीं है कि महापौर रहे नेताओं ने यह मिथक तोडऩे का प्रयास नहीं किया हो, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई है।

  • महापौर यानी कॅरियर पर पूर्णविराम
  • 1. डॉ. खेतलखानी: वर्ष 1994 में नगर निगम के भाजपा बोर्ड में पहले महापौर बने। तीन साल बाद ही इस्तीफा दे दिया। उसके बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा।
  • 2. संगीता सोलंकी: पहले ही बोर्ड की कार्यवाहक महापौर बनी। करीब 15 दिन महापौर रही, लेकिन आगे कोई बड़ा पद नहीं। महिला आरक्षित निगम में इस बार भी पार्षद का चुनाव लड़ रही हैं।
  • 3. राजेन्द्र कुमार गहलोत: पहले ही बोर्ड के तीसरे महापौर बने। इन्होंने वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव बागी होकर लड़ा, हार गए। तब से ही राजनीति में नजर नहीं आ रहे।
  • 4. शिवलाल टाक: कांग्रेस के नेतृत्व वाले दूसरे बोर्ड के महापौर बने। बीच कार्यकाल में ही इस्तीफा दिया। इसके बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा।
  • 5. अब्दुल मजीद गौरी: दूसरे बोर्ड के कार्यवाहक महापौर बने। करीब छह माह महापौर रहे। इसके बाद कोई बड़ा पद नहीं।
  • 6. ओमकुमारी गहलोत: कांग्रेस शासित तीसरे बोर्ड की महापौर बनी। इसके बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा। उम्रदराज होने के बावजूद वे सक्रिय तो रही, लेकिन आगे नहीं बढ़ सकी।
  • 7. रामेश्वर दाधीच: कांग्रेस की अगुवाई वाले ही चौथे बोर्ड में वर्ष 2009 में पहला प्रत्यक्ष चुनाव जीतकर महापौर बने। इसके बाद न तो कोई टिकट मिला और न ही कोई चुनाव लडऩे का मौका।
  • 8. घनश्याम ओझा: भाजपा शासित बोर्ड के निवर्तमान महापौर। वर्ष 2014 में पहली बार चुनाव लड़ा। पार्षद से महापौर बने। लोकसभा, विधानसभा व राज्यसभा तक टिकट की कोशिश की, लेकिन सफलता नही मिली।
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ये पार्षद विधायक भी बने
सूर्यकांता व्यास, भंवर बलाई, मानसिंह देवड़ा, मनीषा पंवार जहां पार्षद रहने के बाद विधायक पद तक पहुंचे हैं, वहीं अमिता चौधरी जिला प्रमुख बनी हैं। राजेन्द्र सोलंकी यूआईटी चेयरमैन रहे। इसके बाद जेडीए अध्यक्ष पद पर रहे। विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन हार गए। इसी तरह राज्य के पूर्व मंत्री राजेन्द्र गहलोत निवर्तमान बोर्ड में पार्षद रहने के बाद हाल ही राज्यसभा सदस्य बने हैं। इसी तरह मेघराज लोहिया राजसिको अध्यक्ष रहे।



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