-नदंकिशोर सारस्वत
जोधपुर. तलहटी के महलों का निर्माण सवाई राजा सूरसिंह ने अपनी रानी सौभाग्य कंवर के लिए सन 1615 में करवाया था। कालान्तर में राजमाताएं व शासकों की विधवा रानियां सुरक्षा की दृष्टि से महलों में रहा करती थीं । महलों का कार्य अधूरा रहने पर राजा गजसिंह प्रथम ने सन 1631 में पूरा करवाया । राजपरिवार की रानियों को महल में लाने के लिए किले के रानीसर तालाब से महलों के अन्दर तक सुरंग भी बनाई गई थी । इसके बाद 24 नवम्बर 1896 को इन महलों में जसवंत फिमेल अस्पताल और सन 1912 में अंग्रेज अधिकारी ह्यूसन के नाम पर एक स्कूल खोला गया । नयनाभिराम सूक्ष्म स्थापत्य वास्तुशिल्प के प्रतीक महल धरातल से 65 फुट ऊंचा बना है । इसमें प्रवेश के लिए एक घाटीनुमा पोल बनी है ।
विभिन्न युद्ध अभियानों के मूक साक्षी भी
जाली, झरोखों की नक्काशी व पच्चीकारी का काम बहुत सन्दर है । महल का दरवाजा अब नहीं है । महाराजा तखतसिंह भी महल में खूब रहे । यह उनका प्रिय महल था । महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय तो राज परिवार, सेवा व गुप्तचरों के अलावा शाही खजाने के साथ महल में खूब रहे । तलहटी के महलों में जहाँ पुराना जनाना ह्यूसन अस्पताल बनाया गया था । वे महल गुलाबराय ने सन 1777 में बनवाए थे । तलहटी के महलों में प्रथम बार राजपूत मुगल स्थापत्य कला का प्रयोग हुआ । विभिन्न युद्ध अभियानों के समय भी तलहटी के महल राजकीय मंत्रणाओं के मूक साक्षी रहे हैं । सवाई राजा सूरसिंह मोटा राजा उदयसिंह के पुत्र थे। तथा ये भी अपने पिता के समान वीर और स्थापत्य प्रेमी थे। पिता के साथ मुगल दरबार में रहने के कारण विशेष अवसरों पर महाराजा अपने जनाना सहित इन महलों में निवास किया करते थे। महाराजा बखतसिंह ने जोधपुर पर अधिकार किया तब वे भी सबसे पहले इसी महल में ठहरे थे । आगे चलकर विभिन्न महकमों का कार्य भी इन महलों में होता रहा । (फोटो-साभार एमएमटी)
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