जोधपुर.
21 साल हो गए करगिल पर विजय प्राप्त किए। देश ने कई वीर जवान भी इसमें न्यौछावर हुए। मारवाड़ की माटी ने भी इसमें अपना योगदान दिया। इतने साल बाद भी वीरों की याद धुंधली नहीं हुई है। उनकी शहादत ने अगली पीढ़ी के दिल में देशप्रेम को ज्यादा प्रगाढ़ किया है। जोधाण के ऐसे वीर जिन्होंने मातृभूमि की सेवा में अपना प्राण न्यौछावर किए, कुछ ऐसी है उनकी दास्तां।
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शहीद होने से पहले कालूराम ने बंकर उड़ा कर 8 घुपैठियों का मारा
पी.आर गोदारा. भोपालगढ़.
क्षेत्र के खेड़ी चारणान गांव निवासी कालूराम पुत्र गंगाराम जाखड़ 28 अप्रेल 1994 को भारतीय सेना की 17 जाट रेजीमेंट में सिपाही के पद पर सेना में भर्ती हुए थे। चार-साढे चार साल बाद ही उनकी तैनाती जम्मू कश्मीर इलाके में हो गई। शहीद कालूराम के बड़े भाई शिक्षक भागीरथ जाखड़ बताते हैं कि कारगिल की पहाड़ी पर करीब 17850 फीट की ऊंचाई पर पीपुल-2-तारा सेक्टर में उन्होंने अपना शौर्य दिखाया। 4 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सेना ने उनकी रेजिमेंट पर हमला बोल दिया था। उस दौरान एक बम का गोला कालूराम के पैर पर आकर लगा और इस वजह से उनका पैर शरीर से अलग ही हो गया था। लेकिन इसके बावजूद भी कालूराम दुश्मनों से लड़ते रहे और अपने रॉकेट लांचर से दुश्मनों का एक बंकर ध्वस्त कर उसमें छिपे 8 घुसपैठियों को मार गिराते हुए खुद भी शहादत का चोला पहन लिया। जाखड़ जिस दिन शहीद हुए उसी दिन सुबह उन्होंने अपनी मां को एक चि_ी भेजी थी। इसमें उन्होंने लिखा था, कि मां तुम मेरी चिंता मत करना। तेरे बेटे के नाम का शिलालेख गांव में लगेगा और तेरे बेटे को एक दिन पूरी दुनिया जानेगी, कि कैसे वह दुश्मनों से लड़ा था।
पत्नी ने शिक्षा को बनाया मिशन
कालूराम की वीरांगना संतोष देवी ने गांव की बेटियों को ही अपनी औलाद मान लिया और उनकी शिक्षा के लिए हरसंभव सहयोग करने की ठान ली। उन्होंने 15 साल पहले 10 लाख रुपए खर्च कर अपने पीहर के गांव बुड़किया के सरकारी बालिका विद्यालय में बेटियों की पढ़ाई के लिए दो कक्षाकक्ष का निर्माण करवाया। ससुराल खेड़ी चारणान गांव के विद्यालय में भी एक कक्षाकक्ष बनाया। इसके साथ ही वे पिछले कई बरसों से हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर इन विद्यालयों में होने वाले कार्यक्रमों में शरीक होती हैं और प्रतिभावान बेटियों को पुरस्कार प्रदान कर उनकी हौसला अफजाई भी करती हैं।
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4 दुश्मनों को मार शहीद हुए भंवरसिंह
पेपाराम राही. बालेसर.
शेरगढ़ क्षेत्र के बालेसर दुर्गावता निवासी भंवर सिंह इंदा कारगिल युद्ध में 28 जून 1999 को शहीद हुआ थे। अपनी शादी के बाद महज 14 दिन बाद ही ड्यूटी पर गए भंवरसिंह को कारगिल युद्ध में ऑपरेशन मेघदूत में दुश्मन से लोहा लेने के लिए चुना गया। 4 दुश्मनों को मार कर उन्होंने मातृभूमि की सेवा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। भंवर सिंह की वीरांगना इंद्र कवर आज भी अपने पति के साथ बिताए मात्र 14 दिन को याद करती है और उन पलों को संजो कर जीवन गुजार रही है।
इसी शहादत से प्रेरणा लेकर आज शेरगढ़-बालेसर क्षेत्र के सैकड़ों युवा सेना में भर्ती होने के लिए आतुर हैं एवं वर्ष 1999 से अब तक करीब 500 से ज्यादा युवा सेना में भर्ती हो चुके हैं। शेरगढ़ तहसील क्षेत्र राजस्थान ही नहीं प्रदेश में पूर्व सैनिक बहुल क्षेत्र है। यहां प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अब तक कई शहीद हो चुके हैं तथा वीर चक्र से लेकर महावीर चक्र भी मिल चुके हैं।
कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं
विडंबना है कि आज देश के लिए भर्ती होने वाले युवाओं के लिए बालेसर-शेरगढ़ में कोई नि:शुल्क प्रशिक्षण संस्थान नहीं है। शेरगढ़ के शहीद सूरमा पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार मदन सिंह सोलंकियातला ने बताया कि यहां के युवा देश की सेवा के लिए सेना में भर्ती होना चाहते हैं, लेकिन राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार की तरफ से युवाओं को प्रेरणा देने एवं प्रशिक्षण देने के लिए कोई संगठन या संस्थान संचालित नहीं है।
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