नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. मारवाड़ के लोक पर्व आखातीज (अक्षय तृतीया) पर शकुन विचार के लिए आयोजित होने वाले परम्परागत धार्मिक अनुष्ठान 'धणी' ने साल भर पहले ही विश्व में बीमारियों के प्रकोप और महामारी के संकेत दे दिए थे। बाईजी का तालाब स्थित घांचियों की बगेची में बरसों से हो रहे इस आयोजन में पारम्परिक ढंग से शुभ-अशुभ का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
अक्षय तृतीया पर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग अलग अलग पारम्परिक तरीकों से ये अंदाज लगाने की कोशिश करते हैं कि इस साल अकाल होगा या सुकाल होगा। ऐसी ही परम्परा जोधपुर में सैकड़ों बरसों से चली आ रही है। घांची समाज इसका आयोजन करता है। इसे धणी प्रथा कहा जाता है। इसके तहत बगेची में समाज के बड़े बुजुर्ग और अन्य लोग एकत्रित होते हैं।
यूं लगाते हैं अंदाज
चौक के बीचों बीच अनाज की ढेरी बनाकर उसमें एक खम्भ (लकड़ी का डंडा) खड़ा किया जाता है। खम्भ के ऊपरी हिस्से में वी-आकार का कांटा लगाया जाता है। दो अबोध बालकों को नहलाने के बाद खंभ के दोनों ओर बांस की पतली खपच्चियां पकड़ा कर खड़ा कर दिया जाता है। एक खपची पर कुंकुम की टीकी लगाकर सुकाल और दूसरी पर काजल की टीकी लगाकर अकाल का प्रतीक बनाया जाता है। जो खपच्ची कांटे की ओर झुक जाती है, उस हिसाब से बुजुर्ग अकाल या सुकाल का अंदाज लगा लेते हैं। धणी कई बार आपदाओं के संकेत भी देती है।
अचेत हो गया था बालक
कार्यक्रम के संयोजक नैनूराम सोलंकी के अनुसार पिछले साल यह आयोजन 7 मई को हुआ था। अनुष्ठान की शुरूआत में ही शगुन के लिए खड़ा बच्चा उल्टियां करते हुए अचानक अचेत हो गया। फिर दूसरे बालकों की जोड़ी को खड़ा किया गया। इस दौरान अकाल और सुकाल दोनों शूलों के न टूटने पर जानकार बुजुर्गो ने सीधे सीधे बीमारियां बढऩे का संकेत बताते हुए प्रकोप की आशंका जाहिर की थी। इस साल यह आयोजन 26 अप्रेल को चुनिंदा लोगों के बीच ही आयोजित किया जाएगा।
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2RcbnX7
0 comments:
Post a Comment