जोधपुर. समय वो भी था जब घर आंगन पक्षियों की चहचहाट से गूंजायमान हो उठता था, लेकिन इन दिनों घर, आंगन में फुदकने वाली चिडिय़ा गौरेया की चहचहाट कम ही सुनाई देती है। दरअसल शहरीकरण के बढ़ते दौर में अब पक्षियों की यह गूंज विलुप्त होने की कगार पर है। इनमे से ही एक है गौरेया। विशेषज्ञों की मानें तो पक्षियों का चहचहाट समृद्धि का संकेत लेकर आती है, लेकिन बढ़ते शहरीकरण दबाव के बीच गौरेया ने भी अपना आशियाना कहीं और बसाने का निर्णय कर लिया। ऐसे में गौरेया के प्रति जागरुकता लाने के उद्देश्य से प्रति वर्ष 20 मार्च को गौरेया दिवस मनाया जाता है। आइए जानते हैं क्यों महत्वूर्ण पक्षी है गौरेया
इंसानों पर करती है भरोसा
वन्यजीवों के लिए कार्य कर रही लक्ष्मी राठौड़ के अनुसार गौरेया ही एक ऐसा पक्षी है जो अपने पक्षी मित्रों से ज्यादा इंसानों पर भरोसा करती है। इसलिए ये हर घर के आंगन या किसी भी कोने मे अपना घर बना लेती है। मान्यता है कि गौरेया जिस घर मे वास करती है वहां सुख समृद्धि निवास करती है। साथ ही इनके चहचहाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ठ हो जाती है। लेकिन इन दिनों शहरीकरण, मोबाइल टॉवर के रेडिएशन व मानव स्वार्थ के चलते गौरेया की संख्या 70 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। इंसानों का पक्षियों के प्रति कम होता प्रेम भी इसका कारण हैं।
बचाने के लिए लें संकल्प
गौरेया की कम होती संख्या पर विशेषज्ञों के अनुसार फसलों और वातावरण में रासायनिक का अधिकाधिक उपयोग, मोबाइल व मोबाइल टॉवर के रेडिएशन, ग्लोबल वार्मिंग, रासायनिक उपयोग से उत्पन्न अनाज खाने से इन्हें गोट नाम की बीमारी हो जाती है। इसके अलावा घरों में पहले की तरह घोंसले भी नहीं बनाए जाते हैं। इसलिए गौरेया को बचाने के लिए घर या आस-पास घोंसला अवश्य लगाएं। जल पात्र में नियमित जल भरे। हर माह रोज 50 ग्राम अनाज गोरिया के लिए पात्र में डालकर रखे।
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