एम आई जाहिर/ जोधपुर ( jodhpur news current news ) .यह सन 2002 की बात है। पत्नी उर्मिला ट्रेन में दो बच्चों के साथ सफर कर रही थी कि मेड़ता में 11 साल के छोटे बच्चे कुणाल की तबियत बिगड़ गई। जोधपुर आते-आते रेलवे से मदद मांगी, नहीं मिली और बच्चा चल बसा। फिर 2012 में 27 वर्षीय बड़े बेटे फिजियोथैरेपिस्ट और डाइटीशियन डॉ अक्षय बोहरा के पेट में जलन हुई और गाड़ी स्टार्ट करने के लिए ड्राइविंग सीट पर बैठा तो थोड़ी देर में उसने भी गोद में दम तोड़ दिया। यह है दो बेटे खो चुके वन मैन आर्मी ( One Man Army News ) सोशल वर्कर ( social worker ) किशोर बोहरा के साथ किस्मत के किए गए सितम की दास्तान। पहले बेटे के निधन के बाद से ही उन्होंने बच्चों को खुश करने का एक अनूठा तरीका निकाला ( Swarnim Bharat )। उन्हें टॉफी( chocolates ) ,( Books ) , स्टेशनरी ( Stationary ) और गुब्बारे ( balloons ) बांटना शुरू किया और यह सिलसिला अब तक जारी है। उन्होंने सेवा के साथ अपने बच्चों की यादें अमर करने का यह तरीका निकाल लिया। बडे़ बेटे को एजुकेशन का शौक था तो वे बच्चों को हर तरह की किताबें बांटते हैं ( latest NRI news in hindi )।
तीर्थ भी सेवा और परोपकार के धाम
बोहरा पहले टे्रन में टॉफी और गुब्बारे साथ बांटते थे, मगर लोग यह सोचते थे कि अनजान आदमी बच्चों को चॉकलेट क्यों दे रहा है। इसलिए चॉकलेट बांटना छोड़ दिया और गुब्बारे, किताबें और स्टेशनरी बांटते हैं। वे पूरे देश में अब तक करीब एक लाख गुब्बारे बांट चुके हैं। बोहरा बद्रीनाथ, केदारनाथ ,रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी, कन्याकुमारी और १२ ज्योतिर्लिंंग में भी यह काम करते हैं। उनका मानना है कि आम तौर पर हमारे यहां के बच्चे अंग्रेजी में कमजोर होते हैं, इसलिए बच्चों को अंग्रेजी व्याकरण की किताब जरूर देते हैं। पता करते रहते हैं कि कहां बच्चों को क्या जरूरत है, वे वहां किताबें बांटते हैं। जरूरतमंद बच्चों की चुपके से मदद करते हैं और सामने भी नहीं आते। अगर कहीं जरूरत पड़ती है तो किताबें और स्मृति चिह्न भी प्रायोजित करते हैं। वे एम्स के पास बन रहे समाज के शिक्षा व चिकित्सा भवन के लिए 11 लाख की सहयोग राशि दे चुके हैं।
हर बच्चे में कुणाल को देखा
दो बेटे थे और ईश्वर को प्यारे लगे, बुला लिया अपने पास। पहला बच्चा गया तो दुनिया सूनी हुई और दूसरा बच्चा गया तो दुनिया ही उजड़ गई। हर बच्चे में कुणाल को देखा और यह काम शुरू किया। बैंक में सर्विस थी। जहां किसी पेरेंट के साथ बच्चा नजर आया नहीं कि उसे गुब्बारा दे दिया। उसके बाद उसके चेहरे पर जो खुशी दिखती उसी में कुणाल का चेहरा नजर आता। मैं तो निमित्त मात्र हूं। भगवान मुझसे यह सब करवा लेता है।
- किशोर बोहरा,प्रतापनगर,जोधपुर
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