अमित दवे/जोधपुर. पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख मसाला फसल जीरे के लिए अगला एक माह निर्णायक साबित हो सकता है। जीरे की बिजाई प्रतिवर्ष अक्टूबर अंत से नवंबर तक होती है। इस बार अक्टूबर-नवंबर में तापमान अनुकूल नहीं होने से 65 प्रतिशत क्षेत्र में जीरे की बिजाई 15 नवंबर से 30 दिसंबर तक हुई। जीरे की फसल अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है। इसे बाजार में आने में 2 माह लग सकते हैं।
आने वाले दिनों में तापमान 28 डिग्री से ऊपर गया तो जीरे की फसल में दिक्कत आएगी। फसल के पकने में हवा, पानी व तापमान आदि कारकों का सकारात्मक रहना जरूरी है। जीरे की फसल को पकने में लगभग 100 दिन लगते हैं। 30 दिसंबर तक मौसम फसल के अनुकूल नहीं था। जनवरी माह में मावठ की बारिश होने से जीरे की फसल में गुणात्मक सुधार हुआ। अब 15 फरवरी से 15 मार्च तक का एक माह का समय जीरे के लिए निर्णायक साबित होगा ।
इस बार कम हुई बुवाई
जीरे का बुवाई क्षेत्र देखा जाए तो इस बार मारवाड़ में जीरे की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। पिछले वर्ष 6.40 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई थी। वहीं इस बार 5.73 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई। इसमें से भी टिड्डियों के प्रकोप से प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में करीब 70 हजार हैक्टेयर में फसल नष्ट हो गई है। शेष करीब 5 लाख हैक्टेयर में ही जीरे की फसल तैयार हो रही है।
देश में सबसे ज्यादा जीरा उत्पादन राजस्थान में
देश में जीरे के कुल उत्पादन में से करीब 55 प्रतिशत जीरा राजस्थान में होता है। बाड़मेर, जैसलमेर, सांचोर, जोधपुर, नागौर, जालौर, पाली जिले जीरे के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। जबकि शेष 45 प्रतिशत जीरा गुजरात में होता है। क्वालिटी और गुणवत्ता के हिसाब से राजस्थान का जीरा अच्छा माना जाता है।
प्रदेश में जीरे की बुवाई हैक्टेयर में
बिंजाई-- वर्ष 2019-20----2018-19
बाड़मेर--176171--- 170000
जोधपुर---170000---168000
जालौर--- 72469--142228
जैसलमेर---70000---70000
नागौर---- 67000---72815
पाली---12000---11000
सिरोही---5725---5500
कुल----573365----639543
हवाओं का अनुकूल रहना जरूरी
15 फरवरी से 15 मार्च तक का समय जीरे की फसल के लिए महत्वपूर्ण है। बारिश, तापमान, पश्चिमी विक्षोभ से आने वाली हवाओं का अनुकूल रहने पर ही फसल अच्छी होगी।
- पुरुषोत्तम मूंदड़ा, अध्यक्ष, जीरा मंडी व्यापार संघ
विशेषज्ञ की लें सलाह
जीरे की फसल के लिए आगामी एक माह महत्वपूर्ण है। इस समय फसल में छाछिया व मैला रोग के प्रकोप की भी संभावना रहती है। इसके बचाव के लिए रोगों का लक्षण दिखने पर तत्काल कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उपचार की जरूरत है, अन्यथा पूरी फ सल के खराब होने की आशंका रहती है।
- डॉ एमएल मेहरिया, वैज्ञानिक व जनसंपर्क अधिकारी, कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर
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