जोधपुर. महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र की ओर से मेहरानगढ़ में आयोजित दस दिवसीय ‘प्राचीन राजस्थानी बही लिपि’ कार्यशाला के पांचवे दिन रविवार को विवाह बहियों में वर्णित रीति-रिवाजों से रूबरू करवाया गया। राजस्थानी भाषा के विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र बारहठ ने कहा कि राजस्थान में बहियों में लिखित इतिहास, साहित्य, संस्कृति के भण्डार को समझने के लिए जोधपुर में प्राच्य विद्या विश्वविद्यालय की आवश्यकता है।
बहियों का सबसे बड़ा और समृद्ध भण्डार जोधपुर में उपलब्ध है। राजस्थान के विभिन्न अंचलों में बोली जाने राजस्थानी व बहियों में लिखित मुडिय़ा/मोड़ी/महाजनी लिपि की शब्दावली के कई शब्दों से शोधार्थियों का परिचय करवाया गया। शोध केन्द्र के विभागाध्यक्ष डॉ. महेन्द्रसिंह तंवर ने राजलोक की बहियों, विवाह एवं ठिकानों की बहियों में रीति-रिवाजों, दस्तूरों, प्रचलित परम्पराओं की जानकारियां दी।
डॉ. तंवर ने बताया कि राजा-महाराजाओं की विवाह की बहियों में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं जब लडक़ी का पिता अपनी पुत्री की शादी से पहले अपनी पुत्री के भविष्य की पूरी सुरक्षा गारण्टी वर यानि पति व उसके परिवार से लेता था कि यदि पति एक से अधिक विवाह कर भी ले तो उसकी पत्नी को पूर्ववत की भांति सम्मान और सभी सुविधाएं मिलती रहेगी।
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