जोधपुर. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद व राज्यपाल कलराज मिश्र एक दिवसीय जोधपुर प्रवास के दौरान शाम करीब 4 बजे विश्व प्रसिद्ध मेहरानगढ़ देखने पहुंचे। मेहरानगढ़ में प्रवेश के बाद लिफ्ट के सामने चौक में मेहरानगढ़ बैंड की ओर से केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस... की धुनों के साथ उनका स्वागत किया गया। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के संरक्षक और पूर्व सांसद गजसिंह ने जोधपुरी बंधेज का साफा पहनाकर राष्ट्रपति का स्वागत किया। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के निदेशक डॉ करनी सिंह जसोल ने मेहरानगढ़ के इतिहास और निर्माण संबंधी जानकारियां दी। किले के लिफ्ट टेरेस पर पहुंचने के बाद में राष्ट्रपति ने जोधपुर के विहंगम दृश्य को निहारा और स्थापत्य कला को अद्भुत बताया। राष्ट्रपति के साथ सैन्य अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे।
कुतुब मीनार से ऊंचा है किला
मेहरानगढ़ किला कुतुबमीनार से भी ऊंचा है। राजस्थान का दूसरा बड़ा शहर और पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा शहर जोधपुर इस किले पर अभिमान करता है और हो भी क्यों नाण्ण्ण् इस किले ने पूरे विश्व में अपनी शान का परचम लहराया है। देशी-विदेशी पर्यटक खास तौर जोधपुर के ऐतिहासिक स्मारक ही देखने आते हैं। रजवाड़ों की शानो-शौकत और गौरवशाली इतिहास को समेटे ये किला जोधपुरवासियों को गर्व की अनुभूति कराता है। वर्तमान में किले से फ्लाइंग फॉक्स भी शुरू हो गया है। जिसमें पर्यटक एक छोर से दूसरे छोर जा सकते हें और ऊंचाई से शहर का भव्य नजारा देख सकते हैं। 125 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित ये किला कुतुबमीनार से भी ऊंचा है। कुतुबमीनार की ऊंचाई 73 मीटर है।
आखिरकार हुआ राजस्थान हाईकोर्ट के नए भवन का उद्घाटन, समारोह की देखें एक्सक्लूसिव फोटोज
100 किलोमीटर दूर से देखा जा सकता है किला
इस दुर्ग के चारों 12 से 17 फुट चौड़ी और 20 से 150 फ ुट ऊंची दीवार है। किले की चौड़ाई 750 फु ट और लम्बाई 1500 फु ट रखी गई है। चार सौ फुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित ये विशाल दुर्ग कई किलोमीटर दूर से दिखाई देता है। बरसात के बाद आकाश साफ होने पर इस दुर्ग को 100 किलोमीटर दूर स्थित जालोर के दुर्ग से भी देखा जा सकता है। कुण्डली के अनुसार इसका नाम चिंतामणी है लेकिन ये मिहिरगढ़ के नाम से जाना जाता था। मिहिर का अर्थ सूर्य होता है। मिहिरगढ़ बाद में मेहरानगढ़ कहलाने लगा। इसकी आकृति मयूर पंख के समान है इसलिए इसे मयूरध्वज दुर्ग भी कहते हैं।
किले में कई पोल व द्वार हैं। लोहापोल, जयपोल और फ तहपोल के अलावा गोपाल पोल, भैंरू पोल, अमृत पोल, ध्रूवपोल व सूरजपोल आदि छह द्वार किले तक पहुंचने के लिए बनवाए गए हैं। इनका क्रम इस तरह संकड़ा व घुमावदार निश्चित किया गया है जिससे दुश्मन आसानी से दुर्ग में प्रवेश ना कर सकें और उस पर छल से गर्म तेल, तीर व गोलियां चलाई जा सकें। दुर्ग के विभिन्न महलों के प्लास्टर में कौड़ी का पाउडर प्रयुक्त किया गया हैए जो सदियां बीत जाने पर भी चमकदार व नवीन दिखाई देता है। श्वेत चिकनी दीवारों, छतों व आंगनों के कारण सभी प्रासाद गर्मियों में ठंडे रहते हैं।
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2rnFbq2
0 comments:
Post a Comment