गजेंद्रसिंह दहिया/जोधपुर. एक ‘बहादुर’ की गर्जना वर्ष 2019 के साथ ही शान के साथ शांत हो जाएगी। ये वो बहादुर है, जो ऊंची पहाडिय़ों पर बैठे दुश्मन और उसके लाव-लश्कर पर अकेला ही भारी पड़ा और इसकी गर्जना भर से दुश्मन को दुम दबाकर भागना पड़ा। भारतीय वायुसेना का लड़ाकू विमान मिग-27 नए साल की पूर्व संध्या पर जोधपुर में अंतिम उड़ान भरेगा। साल के आखिरी सूर्यास्त को सलामी देकर बहादुर नाम से विख्यात इस लड़ाकू विमान की परवाज थम जाएगी। वायुसेना को 38 साल की सेवा के बाद ये विमान रिटायर हो जाएंगे। मिग-27 की औपचारिक विदाई 27 दिसम्बर को जोधपुर वायुसेना स्टेशन पर होगी।
करगिल में दिखा असली रूप
भारतीय वायुसेना में रूस निर्मित यह लड़ाकू विमान 1984 में शामिल हुआ था, लेकिन इसका असली इस्तेमाल 1999 में हुए भारत-पाकिस्तान के करगिल युद्ध में सामने आया। इस युद्ध में वायुसेना के ऑपरेशन सफेद सागर में मिग-27 ने दुर्गम पहाडिय़ों के बीच उड़ान भरकर दुश्मन के ठिकानों, सामग्री डिपो व सप्लाई मार्ग को नेस्तनाबूद कर दिया।
यूं ही नहीं कहलाए फ्लोगर
मिग यानी मिकोयान-गुरेविच विमान भारतीय वायुसेना की अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान रहे हैं। हालांकि दुर्घटनाओं के कारण इन पर सवाल भी उठे और कई बार मिग विमानों को उडऩ ताबूत तक कहा गया। लेकिन वास्तव में तकनीकी रूप से ये सक्षम नहीं होते तो इन्हें नाटो सेनाएं फ्लोगर (सफाया करने वाला) नहीं मानती और न ही ये वायुसेना में बहादुर के नाम से प्रतिष्ठापित होते।
मजबूत इंजन, अचूक निशाना
शक्तिशाली इंजन ने मिग-27 को एक खास तरह का लड़ाकू विमान बनाया। इन विमानों में लगे ऑटोमेटिक फ्लाइंग कंट्रोल सिस्टम, अटैक इंडीकेटर्स और इन-बिल्ट लेजर गाइडेड सिस्टम के कारण बहादुर को दुनिया का सशक्त एयर टू ग्राउंड अटैक फाइटर जेट माना गया। ग्राउण्ड अटैक एयरक्राफ्ट मिग-27 को उड़ाने वाले फायटर पायलट अपने आपको शान से विंग स्विंगर्स कहते हैं। दरअसल इसके विंग कई कोण पर तेजी से घूमते हैं। शुरुआत में 16 डिग्री पर स्विप रहते हैं। युद्ध के समय हथियार लोड होने पर इसके विंग 45 डिग्री पर हो जाते हैं और तेजी से आगे बढ़ता है। दुश्मन क्षेत्र में हथियार गिराने के बाद यह वहां 72 डिग्री कोण पर घूमकर तीर के आकार में उड़ता है। उस समय इसकी स्पीड ग्राउण्ड लेवल पर 1350 किलोमीटर प्रति घण्टा होती है।
इसलिए जल्दी रिटायरमेंट
1960 के दशक में भारतीय वायुसेना में शामिल होने वाले मिग-21 लड़ाकू विमान की अभी भी करीब 6 स्क्वाड्रन पाकिस्तान बॉर्डर पर तैनात है जो इंटरसेप्ट करने के काम आती है, जबकि मिग-27 केवल 35 साल पुराना है फिर भी पहले रिटायर हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिग-27 के कलपुर्जे बहुत महंगे हैं। रूसी कंपनी महंगे दामों पर इनके कलपुर्जों की आपूर्ति करती थी। फिर मिग-27 विमान कम होने के कारण कम्पनी ने कलपुर्जों का उत्पादन भी कम कर दिया। ऐसे में रखरखाव भी भारी पडऩे लगा था। इसके अलावा ये पुराने भी जल्दी हो गए। भारतीय वायुसेना ने करीब 10 प्रतिशत मिग-27 विमान क्रेश में खो दिए। इसी साल फरवरी में पोकरण और मार्च में जोधपुर में 2 मिग-27 विमान क्रेश हुए थे।
अब केवल कजाकिस्तान में
दुनिया में मिग-27 विमान बहुत कम बचे हैं। ग्राउण्ड लेवल पर उडऩे के दौरान थोड़ा सा वजन बढऩे पर स्पीड कम हो जाती है, इससे कुछ ही देशों में इनका इस्तेमाल किया जा रहा था। भारतीय वायुसेना से इनके रिटायर होने के बाद अब केवल कजाकिस्तान एयरफोर्स में ही मिग-27 रह जाएंगे।
सम्मान से देंगे विदाई
जोधपुर में 27 दिसम्बर को होने वाले समारोह में मिग-27 उड़ाने वाले वायुसेना के सभी वायुयोद्धा शामिल होंगे। फ्लाइट पास्ट में 8 मिग-27 विमान एक साथ उड़ान भरेंगे। अलग अलग फॉर्मेशन में उड़ान के बाद विक्ट्री फॉर्मेशन में अंतिम उड़ान होगी। लैंडिंग के समय इन विमानों को वाटर सेल्यूट दिया जाएगा। इसके बाद 29-स्क्वाड्रन कॉम्पलेक्स में मिग-27 से जुड़ी यादें साझा की जाएगी। मिग-27 (अपग्रेडेड) की एकमात्र स्क्वाड्रन स्कोर्पियन (29 स्क्वाड्रन) अभी जोधपुर एयरबेस पर ही है। साल की शुरुआत में मिग-27 की स्क्वाड्रन-10 रिटायर हुई थी। बहादुर की विदाई के बाद जोधपुर एयरबेस पर सिर्फ सुखोई-30 की स्क्वाड्रन रह जाएगी।
अपग्रेडेशन ने दी नई जान
मिग-27 को ग्राउण्ड लेवल पर हाई स्पीड और गन के लिए जाना जाता है। सुपरसोनिक विमान भी लो लेवल पर बहुत कम जाते हैं क्योंकि इसके विंग बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं। इसके साथ रॉकेट, बम और आर-27 मिसाइल भी लगती है। शुरुआत में मिग-27 विमान से बम व रॉकेट मैनुअली तरीक से ड्रॉप किए जाते थे। अपग्रेडेशन होने के बाद ये डिजिटलाइज्ड हो गए और दूर से ही कम्प्यूटर आधारित प्रणाली से लेजर गाइडेड बम व अन्य हथियार से हमला किया जा सकता है। युद्ध में जाने के समय सुखोई-30 और मिग-29 साथ इसको एस्कोर्ट करते हैं। कारगिल युद्ध के समय मिग-27 ने दुश्म के ठिकानों पर बमबारी की थी, जिससे आर्मी को आगे बढऩे में काफी मदद मिली।
बहादुर का मुकाबला नहीं
जोधपुर निवासी सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी जिनेंद्र कुम्भट ने 1450 घण्टे मिग-23 और मिग-27 विमान उड़ाए हैं। कुम्भट जनवरी 2016 से लेकर अक्टूबर 2017 तक जोधपुर वायुसेना स्टेशन के एयर ऑफिसर कमांडिंग रहे। वे कहते हैं कि उनके समय 6 स्क्वाड्रन थी, जिसमें से दो हेलीकॉप्टर स्क्वाड्रन भी शामिल है। इस दौरान मिग-27 की एक भी दुर्घटना नहीं हुई। बकौल कुंभट एक समय मिग-27 जैसा कोई ग्राउण्ड अटैक एयरक्राफ्ट नहीं थी।
मिग-27 फैक्ट फाइल
- 1981 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ
- रूस की मिकोयन गुरेविच कम्पनी मिग जहाज बनाती है
- 200 मिग-27 विमान थे एक समय में भारतीय वायुसेना के पास
- वायुसेना में इसे बहादुर नाम से शामिल किया गया
- यह एक ग्राउण्ड अटैक एयरक्राफ्ट है जो बम, राकेट व मिसाइल दाग सकता है
- विभिन्न कोण से विंग मूव होने के कारण यह विंग सिवंगर्स कहलाता है
- 1350 किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार तक पहुंच सकता है
- जोधपुर वायुसेना स्टेशन पर अंतिम स्क्वाड्रन-29 बची है जो 31 दिसम्बर को रिटायर हो रही है। इसका नाम स्कोर्पियन है।
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