Music के इन्साइक्लोपीडिया हैं गिरधारीलाल विश्वकर्मा

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एम आई जाहिर ( m i zahir ) / जोधपुर ( jodhpur news.current news ). सुरीला लोक संगीत, मधुर सुगम संगीत, दिलकश फिल्मी संगीत, कर्णप्रिय दुर्लभ भजन और खूबसूरत गजलें हों या बेमिसाल नायाब गीत, उन्होंने यह सब शौक-शौक में संजोना शुरू किया और धीरे-धीरे यह पैशन बन गया। उनके कलक्शन में दुर्लभ शास्त्रीय संगीत, राजस्थानी संगीत, गुजराती संगीत और पंजाबी संगीत भी शामिल है। इस तरह अब तो उनके कलक्शन में हर तरह का दुर्लभ संगीत ( Music News ) शामिल है। ये हैं म्यूजिक ( Music World ) के इनसाइक्लोपीडिया गिरधारीलाल विश्वकर्मा। यहां जोधपुर के पाल बालाजी में गायत्रीनगर में है उनका इंडियन म्यूजिक आर्काइव्ज एंड रिसर्च सेंटर ( Indian Music Archives and Research Center ) । हाल ही में जब उन्होंने तबले के जादूगर उस्ताद जाकिर हुसैन को उनके पिता अल्लारक्खा कुरैशी के संगीतबद्ध किये हुए गीतों का कम्पाइलेशन दिया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा।


अला दी बाइ्र्र का सन 1905 का होरी गीत
यहां यह सब देख कर आश्चर्य हुआ कि उनके पास एेसी-एेसी खूबसूरत संगीत रचनाएं हैं, जो आम तौर पर किसी म्यूजिक स्टोर या रेडियो पर भी नहीं मिलतीं। मसलन उनके पास सबसे पुराना अला दी बाइ्र्र का सन 1905 का होरी गीत है। यह आम तौर पर लोगों के कलक्शन में नहीं मिलता। यानी फिल्मों और संगीत गुरुओं की एेसी संगीत रचनाएं- धुनें व गीत, जो आज मिलना मुश्किल हैं, वे भी उनके पास मौजूद हैं। इस तरह हम उन्हें म्यूजिक का इन्साइक्लोपीडिया कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पत्रिका ने उनसे उनके इस शौक और म्यूजिक लाइब्रेरी के बारे में बात की तो उन्होंने कई रोचक बातें बताईं।

दस हजार ग्रामोफोन रिकॉडर्स
म्यूजिक के इनसाइक्लोपीडिया गिरधारीलाल विश्वकर्मा ने बताया कि उन्हें संगीत का शौक बचपन से ही था। बचपन में मुझे रेडियो पर गाने सुनना बहुत अच्छा लगता था, विशेषकर फि ल्मी गीतों में बहुत रुचि थी तो फि ल्मी गीतों की किताबें इकट्ठी करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह शौक जूनून मैं बदल गया और ग्रामोफोन रिकाड्र्स में दिलचस्पी बढऩे लगी। और फि र ग्रामोफोन रिकाड्र्स इकट्ठे करने का जूनून चढ़ा। इसी जूनून के चलते आज मेरे संग्रहालय मैं दस हजार ग्रामोफोन रिकाड्र्स मौजूद हैं, जिसमें कई दुर्लभ रिकाड्र्स हैं। उनके संग्रहालय में गौहर जान, पीआरा साहेब ,जानकीबाई, सुंदरीबाई , भाई छैला ,कल्लू कव्वाल,पीरू कव्वाल ,फख्रे-आलम ,अब्दुल करीम खान,डीवी पलुस्कर,ओंकारनाथ ठाकुर, प्रो. नारायण राव, अख्तरीजान, बाल-गन्धर्व, इन्दुबाला, कमला झरिया,केसरबाई केरकर,एम एस सुब्बुलक्ष्मी,मास्टर भगवानदास , मास्टर मदन, महबूब जान, मिस दुलारी, तमंचा जान,उमर जिया बेगम,विनायक राव पटवर्धन, जी एन जोशी , मनहर बर्वे, मास्टर वसंत अमृत , नगीना जान और रोशनआरा बेगम के गाये दुर्लभ रिकाड्र्स कलक्शन में मौजूद हैं।

राष्ट्रवाद के नायाब रिकॉर्ड
वर्मा ने बताया कि उनके पास 15 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू का देश की जनता को दिए गए सन्देश का रिकॉर्ड भी है। इसके अलावा जन गण मन और वन्दे मातरम के बहुत सारे वर्सन के रिकाड्र्स भी मौजूद हैं। पहली हिंदी फि ल्म के ग्रामोफोन रिकॉर्ड निकले थे, वो थी सन 1982 की फिल्म ‘माधुरी।’ इस फिल्म के दुर्लभ रिकॉर्ड भी उनके संग्रहालय में हैं। वहीं मारवाड़ी के कई दुर्लभ ग्रामोफोन रिकाड्र्स भी हैं। उनका कहना है कि इसे भावी पीढिय़ों के लिए इन दुर्लभ रिकाड्र्स की रिकॉर्डिंग कर के डिजिटल फॉरमेट में सुरक्षित किया जा रहा है। यहां पिछले 30 बरसों से ग्रामोफोन रिकाड्र्स पर रिसर्च किया जा रहा है।

आजादी से पहले के भी कई रिकाड्र्स
उन्होंने बताया कि इस संग्रहालय में आजादी से पहले के भी कई रिकाड्र्स मौजूद हैं। कई ऐसे भूले बिसरे कलाकारों के रिकाड्र्स सहेज कर रखे गए हैं, जिनका आज की पीढ़ी ने नाम भी नहीं सुना होगा। मसलन चम्पा, मास्टर मोहन जूनियर, मास्टर मोतीलाल, मास्टर तुलसीदास, मिस्टर मांगीलाल, मास्टर धनसुख, मास्टर पूसालाल, मिस कलू, मुमताज बेगम, उम्मेदी, हंगामी, खुशाली ढोलन, तुलसीबाई, मिस बाबू, मास्टर शंकरलाल, जस्सी भगतन, मास्टर धनीराम, मिस जेठी, पार्वती, लच्छू, मिस्टर भंवरिया, मिस जसकंवर, धापी बाई और नैनी जैसे कलाकारों के कई रिकाड्र्स संग्रह्रालय में सहेजे गए हैं।

बिछुड़े री घाली पीहर चाली...
वर्मा ने बताया कि हिंदी फि ल्म ‘बाला जोबन’ में पहली बार एक मारवाड़ी गीत शामिल किया -या था ...बिछुड़े री घाली पीहर चाली ....जिसे मरुतिराव पहलवान ने गाया था। इस दुर्लभ गीत का रिकॉर्ड भी संग्रहालय मैं मौजूद है। संग्रहालय में सबसे पुराना 1914 का मारवाड़ी रिकॉर्ड है . जिसमें हंगामी, उम्मेदी, सागर और खुशाली ढोलन की गाई हुई रचनाएं शामिल हैं। यहां खास एक मांड है ‘ म्हारी सेजां सूनी आवो आवो ......’ और दूसरी सेठना है ‘बयान्हींजी तो मारां मामा लागे....।’

डिजिटलाइजेशन और डॉक्युमेंटेशन हो रहा
उन्होंने बतायाकि उनके इस कलक्शन का पिछले सात बरसों से इन गीतों के डिजिटलाइजेशन और डॉक्युमेंटेशन किया जा रहा है। अब तक सन 1932 से 1957 तक के हिन्दी फिल्मों के 1500 गीतों का डिजिटलाइजेशन हो चुका है। इसके अलावा 5 हजार राजस्थानी गीतों और 5 हजार गैर फिल्मी गीतों का भी डिजिटलाइजेशन और डॉक्युमेंटेशन हो चुका है।

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