जोधपुर.
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (ICUN) की रेड डाटा सूची में विलुप्तप्राय: श्रेणी में शामिल राजस्थान के राज्यपक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (great indian bustard) के कुनबे की बढऩे की उम्मीद जगी है। वैज्ञानिकों और पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि गोडावण के कुनबे में वृद्धि की शत प्रतिशत सफलता के लिए अभी दो साल तक इंतजार करना होगा।
केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की विशेष परियोजना 'स्पिीसीज रिकवरी प्रोग्राम' के तहत विलुप्त प्राय: गोडावण पक्षी के संरक्षण के लिए गत मार्च में 'हैबिटैट इम्प्रूवमेंट एंड कंजर्वेशन ब्रीडिंग ऑफ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' परियोजना शुरू की गई थी। इसके तहत गोडावण संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकार तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के मध्य त्रिपक्षीय समझौता हुआ और जैसलमेर के सम में गोडावण के अंडों के लिए विश्व का पहला कृत्रिम हैचिंग सेन्टर स्थापित किया गया। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की स्वीकृति से गोडावण के 9 अंडो को प्राकृतिक आवास से एकत्र कर कृत्रिम हैचिंग सेन्टर में इन्क्यूबेशन पर रखा गया। इन अन्डों से पहला चूजा इसी वर्ष 21 जून को और एक सप्ताह के अन्तराल में 8 और चूजे निकल आऐ।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी वैज्ञानिक नए नौ मेहमानों की गतिविधियों पर २४ घंटे नजर रखे हुए हैं। चूजों को मानवीय हस्तक्षेप और व्यवहार से पूरी तरह दूर रखा गया है। करीब दो साल बाद वयस्क गोडावणों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा। यदि प्रकृति में उनकी संख्या में प्रजनन से बढ़ोतरी होगी तो यह पक्षी वैज्ञानिकों और परियोजना की सबसे बड़ी सफलता मानी जाएगी।
विश्व में कुल 150 गोडावण
वर्तमान में विश्व में करीब 150 गोडावण बचे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान की ओर से जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) में वर्ष 2014 में 38, 2015 में 40, 2016 में 37 तथा 2017 में 37 में गोडावण देखे गए।
गोडावण मुख्यत: डीएनपी सेंचुरी के सुदासरी, गजेई माता, आरवीके क्लोजर, मोकला, कन्नोई, चांधन, नाथजी का टांका, नाचना, खेतोलाई, पोकरण व रामदेवरा में विचरण करते हैं। मानवीय हस्तक्षेप से इनके आवास स्थल लगातार नष्ट हो रहे हैं।
कृत्रिम हैचिंग सेन्टर से बढ़ेगी संख्या
सरकार की ओर से शुरू की गयी कृत्रिम हैचिंग सेन्टर विशेष योजना से गोडावण की संख्या में बढ़ोतरी होगी और इस दुर्लभ पक्षी के व्यवहार पर उत्कृष्ट शोध भी होगा। गोडावण के प्राकृतिक आवास स्थलों के संरक्षण के लिए स्थानीय जन सहयोग के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।
डॉ हेमसिंह गहलोत, इन्चार्ज डीएसटी-एसइआरबी रिसर्च प्रोजेक्ट,
सहायक आचार्य, जेएनवीयू जोधपुर
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