जोधपुर ।
आरटीआइ से प्राप्त तथ्यों के आधार पर यह कहना सही होगा कि रेलवे में पारदर्शिता नाम की कोई चीज नहीं है। यहां फैसले रेलमंत्री व उच्चाधिकारियों की मनमर्जी से होते है। ऐसे अनेकों उदाहरण पिछले कुछ दिनों में आए है। चाहे गलत आंकड़ें पेश करना का मामला हो या पॉलिसी की धज्जियां उठाते हुए ठहराव देने की। अब बात ठहराव के बाद की स्थिति की करे तो सामने आया कि मोदी सरकार वन/टू ने अपने अब तक के कार्यकाल में करीब 1 हजार से ज्यादा ट्रेनों के ठहराव दिए है, जिसमें एक भी ट्रेन ठहराव की समीक्षा नहीं की गई । दरअसल एक्सप्रेस ट्रेनों के प्रायोगिक ठहराव में रेलवे हर प्रायोगिक ठहराव के आदेश में छह माह का प्रायोगिक ठहराव प्रदान करते हुए यह लिखता है। इस ठहराव को समीक्षा के बाद आगे बढ़ाया जा सकता है। हकीकत यह है कि रेलवे ठहराव देने के बाद इनकी कभी समीक्षा ही नहीं करता। रेलवे समीक्षा करेगा भी तो कैसे, ट्रेनों के ठहराव तो नेताओं की मर्जी से होते है। इससे आवश्यकता वाले स्टेशनों को वैसे ही ठहराव नहीं मिलते, पॉलिसी सिर्फ ठहराव नहीं देने वाले स्टेशनों पर लागू होती है । ठहराव देने के बाद वापस लेने का तो इतिहास ही नहीं है । यह जानकारी आरटीआइ कार्यकर्ता दीददयाल बंग द्वारा रेलवे बोर्ड से मांगी गई जानकारी में सामने आइ है।
--
ठहराव के बाद नहीं होती समीक्षा
रेलमंत्री द्वारा सांसदों की मांग पर पहले छह माह के लिए प्रायोगिक ठहराव का आदेश दिया जाता है। साथ ही समीक्षा के बाद आगे बढ़ाने की बात की जाती है। रेलवे फि र अगले कुछ दिनों में ही उस आदेश को आगामी आदेश तक बढ़ा भी देता है।
--
रेलवे से सवाल-जवाब
सवाल -रेलवे बोर्ड के प्रायोगिक ठहराव को नियमित करने को लेकर क्या नियम है ।
रेलवे- वाणिज्यिक औचित्यपूर्ण होने पर ।
तर्क- कुछ दिन पहले एक स्टेशन पर छह माह के प्रायोगिक ठहराव के दौरान 7-7 यात्री अप/डाउन मिले व 765-765 रुपए अप/डाउन आय अर्जित हुई। उस ठहराव को एक माह बाद ही बगैर समीक्षा आगामी आदेश तक बढ़ा दिया ।
सवाल -क्या प्रायोगिक ठहराव के बाद समीक्षा की जाती है ।
रेलवे- हां समय-समय पर की जाती है ।
तर्क- पिछले पांच साल में एक प्रायोगिक ठहराव की भी समीक्षा नहीं की गई। यह रेलवे बोर्ड स्वयं कह रहा है।
सवाल- आखिरी बार किस प्रायोगिक ठहराव की समीक्षा की गई, कॉपी उपलब्ध कराए।
रेलवे- 2013 में आखिरी बार प्रायोगिक ठहराव की समीक्षा की गई। साथ ही 2014 में दिए गए कुछ प्रायोगिक ठहरावों को आगामी आदेश तक बढ़ाने की कॉपी उपलब्ध कराइ।
तर्क- जब समीक्षा ही नहीं गई तो कॉपी कहां से उपलब्ध कराते । 2013 में भी किसी ठहराव की समीक्षा की गई तो कॉपी उपलब्ध क्यों नहीं कराई ।
सवाल- आखिरी बार कौनसी ट्रेन का पॉलिसी के अनुसार आय नहीं होने से ठहराव वापस लिया ।
रेलवे- रेलवे बोर्ड के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं ।
सवाल- वर्ष 2014-15 से 2018-19 तक कितने प्रायोगिक ठहराव प्रदान किए गए। इनमें कितने ठहराव की समीक्षा की गई ।
रेलवे- इस सवाल का भी रेलवे बोर्ड के पास जवाब नहीं था ।
[MORE_ADVERTISE1]from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2OvAemp
0 comments:
Post a Comment