जोधपुर. धर्म अध्यात्म केंद्र संबोधि धाम ( sambodhi dham ) में आयोजित पीसफुल माइंड प्रोग्राम ( Peaceful Mind Program ) में साधकों ने जीने के नए प्रयोग सीखे। इस दौरान राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर ( Nation saint Chandraprabh Sagar ) ने कहा कि प्रगति के लिए दिमाग में तीन गुण अपनाइए - 1. पीसफुल माइंड ( Peaceful Mind ), 2. पॉजिटिव माइंड ( Positive Mind ) और 3. पावरफुल माइंड ( Powerful Mind )। शान्त, सकारात्मक और शक्तिमान होना हर सफल जीवन का आधार है।
जीने की कला यही गुर सिखाती है कि सामने वाले का लोहा भले ही गर्म हो जाए, पर हमारा हथौड़ा तो ठण्डा ही रहना चाहिए। हम खुद को हैप्पीमैन बनाएँ, एंग्रीमैन नहीं। एंग्रीमैन केवल फिल्मों में ही खलनायक की भूमिका निभाते अच्छे लगते हैं, रीयल लाइफ में तो हैप्पीमैन ही पसंद किए जाते हैं। क्रोध करने वाले लोग घरवालों को भी अच्छे नहीं लगते, फिर दूसरे लोगों को कहाँ से प्रिय होंगे? क्रोध साँड है, भला कौन इसका सींग खाना चाहेगा? क्रोध तो माचिस की तीली की तरह है। थोड़ा-सा घर्षण लगते ही आग सुलग उठती है। अरे भाई! माचिस में तो अक्ल नहीं है। इसलिए सुलग उठती है। आपमें तो अक्ल है, फिर क्रोध पर कंट्रोल क्यों नहीं करते? किसी ने मुझसे पूछा कि क्रोध क्या है? मैंने उसे सहज जवाब दिया कि दूसरे की गलतियों की सजा खुद को देना। क्रोध तो तात्कालिक पागलपन है। कौन होगा, जो यह पागलपन दोहराएगा। उम्मीद है आप समझदार हैं। अपनी समझदारी का इस्तेमाल कीजिए और अपने उग्र स्वभाव को सरल स्वभाव में बदलिए।
उन्होंने कहा कि यदि आप क्रोध से परेशान हैं तो सदा मुस्कराने की आदत डालें। क्रोध का निमित्त खड़ा हो जाए तो पहले मुस्कराएँ, फिर क्रोध करें - क्रोध कम आक्रामक होगा। अगर दूध उफनने लगे तो हम पानी का छींटा डालते हैं। आप इसी नुस्खे का इस्तेमाल कीजिए। जैसे ही लगे कि आपमें उफान आ गया है, तत्काल दो गिलास ठंडा पानी पी लीजिए। उधर उफनता दूध शांत, इधर आपका उबाल शांत।
संत चंद्रप्रभसागर ने कहा कि क्रोध में बनाया गया भोजन और बच्चों को पिलाया गया दूध जहर की तरह नुकसानदेह होता है। क्रोध पैदा हो जाए तो पहले 15 मिनट सो जाएँ, तन-मन को रिलेक्स करें, उसके बाद ही कोई कार्य निपटाएँ। क्रोध में एक बार अपना चेहरा आईने में देखने की तकलीफ उठाएँ। आपको अपने आपसे नफरत होने लगेगी। तब आप अनायास ही अपने क्रोध को वैसा ही थूक देंगे, जैसे कि मुँह से कफ। कोशिश कीजिए कि क्रोध को हमेशा धैर्यपूर्वक प्रकट करने की आदत डालिए। थोड़ा-सा धैर्य आपके क्रोध को जीतने का मंत्र बन जाएगा। धीरज से सोचने पर कई दफा लगता है कि मैं व्यर्थ ही क्रोधित हुआ। क्रोध के बाद पैदा हुए प्रायश्चित्त से प्रेरणा लीजिए और निर्णय कीजिए कि मैं भविष्य में आगे-पीछे का सोचकर ही तेजी खाऊँगा।
उन्होंने कहा कि जो बात आप तैश में आकर कहते हैं, यदि वही धैर्य और शांति से कहने की आदत डाल लें तो आपको आज की तरह दु:ख और प्रायश्चित्त का सामना नहीं करना पड़ता। संतप्रवर ने सावधान करते हुए कहा कि जरा सोचें कि कब तक यूँ ही उफनते और फुफकारते रहेंगे। अगर मरकर साँप या साँड बनने की चाह हो तो पूरी आजादी से क्रोध कीजिए, वरना क्रोध का निरोध कीजिए। अगर आप सही हैं तो आपको क्रोध करने की ज़रूरत नहीं है और अगर गलत हैं तो इसका मतलब है कि हमें गुस्सा करने का हक नहीं है। जीवन में बार-बार क्रोध को न्यौता मत दीजिए, अन्यथा वह यमदूत की तरह आएगा और आपकी सुख-शांति को चौपट कर जाएगा। प्लीज! गुस्से को कहिए गो। ज्यादा गुस्सा करेंगे तो पत्नी सुबह 9 बजे घड़ी देखेगी और कहेगी - क्या बात है आप अभी तक ऑफिस नहीं गए? प्रेम से पेश आने वाले व्यक्ति के लिए शाम को घड़ी देखी जाती है - रात के 8 बज गए, क्या बात है, वे अभी तक नहीं आए। आप क्या चाहते हैं, आपकी पत्नी सुबह घड़ी देखे या शाम को?
क्रोध जीतने का मंत्र देते हुए संत प्रवर ने कहा कि कृपया बड़े साइज का एक कागज़ लीजिए और उस पर भगवान महावीर की यह वाणी लिख दीजिए — हे जीव! अब तो शांत रह। कब तक यूँ ही हो-हल्ला करता रहेगा। बस, इस कागज को घर के आंगन में चिपका दीजिए और जैसे ही गुस्सा आए तो इसे पढ़ डालिए। आपकी अंतरात्मा में तत्काल शांति की रोशनी खिल उठेगी। सप्ताह में एक दिन चार घंटे का अखंड मौनव्रत रखने की आदत डालिए। मौन से जहाँ वचनसिद्धि सधेगी, वहीं क्रोध के तेवर का तीखापन कम होगा। सुबह उठते ही एक मिनट तक तबीयत से मुस्कराइए। जीवन में ज्यों-ज्यों मुस्कान के फूल खिलेंगे तो चिंता, क्रोध, तनाव के काँटे स्वत : निष्प्रभावी होते जाएंगे।
अन्य मंत्रों में संत ने कहा कि हर महीने की पहली तारीख को उपवास करने की आदत डालिए। यह उपवास भोजन नहीं करने का न हो, बल्कि क्रोध न करने का हो। भला, क्रोध न करने से बढ़ कर और क्या तपस्या होगी। जब संतप्रवर ने प्राण प्राण में शांति दीप जल जाए, धरती पर स्वर्ग उतर आए...भजन गुनगुनाया तो सभी श्रद्धालु हर्ष विभोर हो गए। इससे पूर्व डॉ मुनि शांतिप्रिय सागर ने श्रद्धालुओं को मंत्रप्रार्थना के साथ सक्रिय योग के 8 चरणों का प्रशिक्षण दिया।
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