जोधपुर. बदलते वक्त के साथ जोधपुर में त्योहार का भी रंग बदलने लग गया है। पहले जहां घरों में दिवाली से पूर्व महिलाएं ‘हाकळियां-खाजळियां’ (खाजे) रसोइयों में बनाती थीं, वे खाद्य आइटम अब बाजारों में बिकने लगे हंै। इन आइटमों के खरीदार भी खूब हैं। ‘हाकळियां-खाजळियां’ को विशेष रूप से रामा-श्यामा के दिन मेहमान नवाजी के काम में लिया जाता है।
इन दिनों मैदा, आटा व बेसन से बनने वाली ‘हाकळियां-खाजळियां’ बाजारों में खूब बिक रही है, वहीं दिवाली पर घरों में मिश्री के गूंजे बनाए जाते थे, ये आइटम भी आजकल बाजारों में ही उपलब्ध हो रहे हैं। भीतरी शहर में हरेक कोने में इन आइटमों की स्थाई व अस्थाई दुकानें खुल गई हैं। खाजे इन दिनों बाजार में 2 सौ तो गूंजे 350 रुपए किलो बिक रहे हैं। इन्हें खरीदने के लिए लोगों की कतारें लगी हुई हैं।
वर्किंग वुमंस ज्यादा कर रही दुकानों से खरीदारी खाजे की ज्यादातर बिक्री भी भीतरी शहर में होती है। खरीदारी भी ज्यादातर वर्र्किंग वुमंस ही करती है। क्योंकि नौकरी पेशा महिलाओं को घरेलू कार्यों में ज्यादा फुर्सत नहीं मिल पाती। 82 वर्षीय गंगा देवी पुरोहित का कहना हैं कि पूर्व में संयुक्त परिवार के कारण महिलाएं दिवाली से दो-तीन दिन पहले खाजे बनाकर तैयार कर देती थी।
इनमें नमक-मिर्ची डालने का कार्य भी एक्सपर्ट महिलाओं के हाथों होता। ताकि ये स्वादिष्ट बन सके। रामा-श्यामा के दिन सभी लोग एक दूसरे के घर जाकर ‘हाकळियां-खाजळियां’ को टेस्ट करते थे। फिर उसमें कमी-पेशी बताया करते थे। ज्यादातर तारीफ करने पर घर की बहुएं खुश होती थी।
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