बालसुधार गृह बंद करने के निर्णय को बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष बेनीवाल ने बताया अनुचित

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जोधपुर. राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष संगीता बेनीवाल ने कोटा, जोधपुर, राजसमंद, अजमेर, टोंक, सीकर, जयपुर, भरतपुर जिले में स्थापित बाल सुधार गृह (किशोर सम्प्रेषण गृह) बंद करने के आदेश को अनुचित बताते हुए इस पर पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। बेनीवाल ने शनिवार को ‘पत्रिका’ से बातचीत में कहा कि ऐसे मामलों में जिस संवेदनशीलता से सरकारी संस्थाएं काम करती हैं वैसी अपेक्षा एनजीओ से नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा इस पर पुनर्विचार के लिए सोमवार को मुख्यमंत्री से बातचीत की जाएगी।

विभाग के आयुक्त और शासन सचिव ने गत 4 अक्टूबर को आदेश जारी कर 6 से 18 वर्ष तक के बालकों के लिए प्रदेश के आठ जिलों में संचालित राजकीय किशोर गृह बंद करने और राजकीय किशोर गृह में संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों को जिले में पंजीकृत गैर राजकीय बाल गृहों (एनजीओ) में स्थानान्तरित करने को कहा था। राजस्थान उच्च न्यायालय में न्यायाधीश संदीप मेहता की एकल पीठ ने गत छह अक्टूबर को स्वप्रसंज्ञान के आधार दर्ज एक याचिका की सुनवाई के दौरान आश्चर्य जताते हुए कहा था कि ऐसा निर्णय लेने से पहले सरकार ने कोर्ट को अवगत कराना उचित नहीं समझा। हालांकि मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी।

पांच साल में 450 से अधिक बच्चों का जीवन बदला
गत पांच वर्ष में 450 से अधिक बच्चों को उनके घर पहुंचाया अथवा भिक्षावृति, बालश्रम से मुक्त बच्चों को आर्थिक योजनाओं या विद्यालयी शिक्षा से जोड़ा गया।

क्या है राजकीय सम्प्रेक्षण गृह
किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत जिले में 2 प्रकार के बच्चे राजकीय गृहों प्रवेशित किए जाते हैं। ऐसे बालक- बालिकाएं जो किसी न किसी आपराधिक कृत्य में लिप्त होते हैं, जिनकी सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड में होती है, उन बच्चों को राजकीय सम्प्रेक्षण गृह में रखा जाता है। अनाथ, उपेक्षित, परित्यक्त, गुमशुदा, भिक्षावृति, बालश्रम, बंधुआ मजदूर और फुटपाथ पर रहने वाले बच्चे, जिनक विशेष देखभाल, संरक्षण और सुनवाई का निपटारा बाल कल्याण समिति करती है, ऐसे बच्चों को राजकीय किशोर गृह में रखा जाता है।

सरकार की ओर बंद करने के निर्णय के कारण
राज्य में 33 जिलों में 33 राजकीय किशोर सम्प्रेक्षण गृह हैं। छोटे जिलों में दोनों श्रेणी के बालकों की संख्या पांच से दस ही है। जबकि बड़े जिलों में यह संख्या 50 से 100 तक है। बाल सुधार गृह बंद करने के पीछे बच्चों के इस अनुपात को सहीं करना भी हो सकता है। प्रदेश के 8 जिलों में राजकीय किशोर गृहों को समाप्त करने के पीछे एक अन्य कारण अपराधी और उपेक्षित बच्चों के आपसी संपर्क को रोकना भी हो सकता है।

मुख्यमंत्री के गृह जिले में हो चुका भूमि का आवंटन
बाल अधिकारिता विभाग जोधपुर के सहायक निदेशक डॉ. बीएल सारस्वत का कहना है कि जोधपुर में राजकीय किशोर गृह समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। यहां राजकीय किशोर गृह पृथक से स्थापित करने के लिए भूमि आवंटित हो चुकी है। बजट मिलने पर भवन बन जाएगा तो दोनो श्रेणी के बालकों के लिए जोधपुर में गृह बन जाएगा। हालांकि आदेश पर स्टे लगने के बाद बच्चों को अन्य गृहों में ट्रान्सफर नहीं किया गया है।



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